मानो तो निवेशक हैं, ट्रेडर हैं अन्यथा

यकीन नहीं आता। लेकिन कॉरपोरेट कार्य मंत्रालय की तरफ से निवेशकों को पूंजी बाज़ार में पारंगत बनाने के लिए जारी 156 पेज की नई किताब के पेज नंबर 84 पर बताया गया है कि, ‘भारतीय बाज़ार में केवल रिटेल निवेशकों को ही डे-ट्रेड की इजाज़त है।’ डे ट्रेडिंग का मतलब शेयरों की उस खरीद-फरोख्त से है, जिन्हें दिन के दिन में निपटा लिया जाता है। बाज़ार बंद होने से पहले ही सारी पोजिशंस काट ली जाती हैं। मेरे ख्याल से इंट्रा-डे और डे ट्रेडिंग एक ही चीज़ हुई। आप जानते ही हैं कि शेयर बाज़ार निवेश का सबसे रिस्की माध्यम है और उसमें भी इंट्रा-डे ट्रेडिंग में सबसे ज्यादा जोखिम है। ऐसे में यह कैसे संभव है कि सबसे ज्यादा रिस्की खेल में सबसे ज्यादा नादान रिटेल निवेशकों को ही घुसने की आज़ादी है? बाकी उस्ताद लोग बाहर खड़े होकर तमाशा देखते रहें!! यह तो किसी मासूम बच्चे को खूंखार शेर के पिजड़े में भेजने जैसी बात हुई।

क्या कीजिएगा, अपने बाज़ार और सरकार की हालत ऐसी ही है। बहुत सारे भ्रम हैं। जैसे, अब भी अधिकांश लोग मानते हैं कि शेयर बाज़ार सट्टा बाज़ार है। यह अलग बात है कि डरते-डरते ही सही, ऐसा माननेवाले लोग भी मौका मिलते ही शेर के इस पिजड़े में झांक लेना चाहते हैं। ट्रेडिंग करना चाहते हैं। ट्रेडिंग में घाटा खाते हैं तो निवेशक बन जाते हैं। विद्वान लोग अपनी तरफ से उनको ज्ञान देते हैं कि शेयर बाज़ार में लांग टर्म देखना चाहिए, शॉर्ट टर्म नहीं। लंबा निवेश करो क्योंकि छोटे में गच्चा खा जाओगे। ट्रेडर मत बनो, इनवेस्टर बनो।

शब्दो का जाल है। भ्रम का पिटारा है। उस्तादों की मौज है। जमूरा पिट रहा है। एक्सचेंज डंका बजाता है – सोचकर, समझकर, इनवेस्ट कर। लेकिन कोई साफ नहीं करता कि इनवेस्टमेंट का मतलब क्या है। शेयर बाज़ार का निवेशक या इनवेस्टर वो है जो किसी खास शेयर में नहीं, बल्कि खास बिजनेस में, खास कंपनी में निवेश करता है। वह जानता-समझता है कि उस उद्योग में क्या ऊंच-नीच चल रहा है और संबंधित कंपनी कैसे दूसरों पर बीस पड़ रही है या भविष्य में पड़ेगी। वह भावी कैश फ्लो से लेकर कंपनी व उद्योग के लिए पूंजी की लागत, उसकी ऋणग्रस्तता और पूरे बाज़ार के सापेक्ष उस शेयर की चंचलता या वोलैटिलिटी, बीटा को आंकता है। फिर निवेश करता है।उसका निवेश शेयर जैसे प्रपत्र में नहीं, बल्कि धंधे में उतरी कंपनी में होता है। उसके पास कम पूंजी है, इसलिए वह शेयर खरीद रहा है। ज्यादा पूंजी होती तो खुद वह बिजनेस डाल देता।

अब खुद सोचिए कि हममें से कितने लोग सही मायनों में इनवेस्टर या निवेशक हैं। हकीकत यही है कि हम सभी मूलतः ट्रेडर हैं। हम पहले इस सच तो स्वीकार करेंगे, तभी शेयर बाज़ार से कमाई कर सकते हैं। नहीं तो हम हमेशा गंवाते रहेंगे, कभी शॉर्ट टर्म में तो कभी लांग टर्म में। मित्रों मैं भी ट्रेडिंग को तुच्छ मानते हुए निवेशक-निवेशक चिल्लाया करता था। लेकिन ऑनलाइन ट्रेडिंग एकेडमी में महीने भर पहले आज ही के दिन चेतन पोतदार ने भ्रम की सारी चादरों को चिंदी-चिंदी कर दिया। उन्होंने दो-टूक लफ्ज़ो में कहा – बिजनेस पर फोकस है, तभी आप निवेशक हैं। फोकस अगर शेयर के भाव पर है तो आप ट्रेडर हैं।

निश्चित रूप से निवेश लांग टर्म या लंबे समय के लिए होता है। लेकिन ट्रेडिंग का मतलब इंट्रा-डे या डे ट्रेडिंग ही नहीं। ट्रेडिंग जरूरी नहीं है कि शॉर्ट टर्म हो। स्विंग ट्रेडिंग तीन से पांच दिन के लिए, मूमेंटम ट्रेडिंग दस से पंद्रह दिन के लिए और पोजिशन ट्रेडिंग दो-तीन महीने के लिए। सक्रिय निवेशक दो-तीन साल के लिए ट्रेड करते हैं। हम सभी दरअसल ट्रेडर हैं। 95 फीसदी रिटेल निवेशक डे ट्रेडिंग करते हैं और पूंजी गंवा बैठते हैं। वहीं पांच फीसदी प्रोफेशनल ट्रेडर डे-ट्रेडिंग नहीं करते और बाज़ार से नोट बनाते हैं। ट्रेडिंग चेस या शतरंज के खेल की तरह है। पोतदार बताते हैं कि दस साल तक ट्रेडिंग के बाद जो हुनर आएगा, वह डे-ट्रेडिंग में पहले दिन से चाहिए। ऐसे में इंट्रा-डे सौदों में लोगों की पूंजी का डूबना लाज़िमी है। लेकिन यह बात अब भी हज़म नहीं हो रही है कि सरकार ने डुबोने के लिए रिटेल निवेशकों को ही क्यों चुना है?

खैर, बहुत-सी बाते हैं। कई महीनों के अंतराल के बाद फिर से आपके बीच में हूं। बदलना, पढ़ना और कठिन मेहनत। वैसे तो मैं पहले से इसी मंत्र का पालन कर रहा हूं। लेकिन चेतन पोतदार के मुंह से ये बातें सुनने के बाद मैं उनका कायल हो गया हूं। मैंने मन ही मन उनको अपना गुरु मान लिया है। साथ ही उनसे गुरु बनने की विनती भी कर दी है। देखिए गुरु द्रोण इस बार भी एकलव्य को शिष्य बनाते हैं कि नहीं!

आपने नोट किसी होगा कि मैंने अब ट्रेडिंग की सलाह देनी शुरू कर दी। सोमवार से शुक्रवार तक ट्रेडिंग की टिप्स और शनिवार को लंबे निवेश के लिए भविष्य में दमकने वाला कोई हीरा। इस बीच मैं फाइनेंस और इकनॉमिक्स से लेकर दर्शन तक की पढ़ाई भी कर रहा हूं। संयोग से मेरी मेहनत और आपका धैर्य अब अपना प्रताप दिखा रहा है। पिछले हफ्ते स्विंग ट्रेडिंग के लिए सुझाए गए पांचों शेयर निशाने पर लगे हैं। सोम व मंगल को बताए गए शेयर शुक्रवार तक अपना लक्ष्य हासिल कर चुके हैं। बाकी देखिए कि अगले दो-चार दिन में क्या करते हैं।

अपनी कोशिश है कि स्ट्राइक रेट भले ही शुरुआती 100% पर न टिक सके, लेकिन 85% तो होना ही चाहिए। मार्च तक यह सेवा मुफ्त चलेगी। पहली अप्रैल को नए वित्त वर्ष की शुरुआत के साथ इसे पेड-सर्विस बना दिया जाएगा। इसलिए नहीं कि मुझे इससे कमाना है, बल्कि इसलिए कि अर्थकाम को अपने पैरों पर खड़ा करना है। मैं रहूं या न रहूं, मैं करूं या न करूं, अपने जैसे लोगों तक, इस देश के साधारण बंदों तक ज्ञान की अजस्र धारा पहुंचती रही। यही अपनी कामना है। यही अपना संकल्प भी है। भरोसा है कि कामयाबी मिलेगी। आज नहीं तो कल सही, क्योंकि इससे मेरा नहीं, समूचे हिंदी समाज और व्यापक हिंदुस्तान का हित ‘अटैच्ड’ है।

1 Comment

  1. A Crash Course in Economics

    SOCIALISM
    You have 2 cows.
    You give one to your neighbor.

    COMMUNISM
    You have 2 cows
    The State takes both and gives you some milk.

    FASCISM
    You have 2 cows.
    The State takes both and sells you some milk.

    BUREAUCRATISM
    You have 2 cows.
    The State takes both, shoots one, milks the other and then throws the milk away.

    TRADITIONAL CAPITALISM
    You have two cows.
    You sell one and buy a bull.
    Your herd multiplies, and the economy grows.
    You sell them and retire on the income.

    VENTURE CAPITALISM
    You have two cows.
    You sell three of them to your publicly listed company, using letters of
    credit opened by your brother-in-law at the bank, then execute a debt/equity
    swap with an associated general offer so that you get all four cows back,
    with a tax exemption for five cows.
    The milk rights of the six cows are transferred via an intermediary to a
    Cayman Island Company secretly owned by the majority shareholder who sells
    the rights to all seven cows back to your listed company.
    The annual report says the company owns eight cows, with an option on one more.

    AN AMERICAN CORPORATION
    You have two cows.
    You sell one, and force the other to produce the milk of four cows.
    Later, you hire a consultant to analyze why the cow has dropped dead.

    A FRENCH CORPORATION
    You have two cows.
    You go on strike, organize a riot, and block the roads, because you want three cows.

    AN ITALIAN CORPORATION
    You have two cows, but you don’t know where they are.
    You decide to have lunch.

    A SWISS CORPORATION
    You have 5,000 cows. None of them belong to you.
    You charge the owners for storing them.

    A CHINESE CORPORATION
    You have two cows.
    You have 300 people milking them.
    You claim that you have full employment and high bovine productivity.
    You arrest the newsman who reported the real situation.

    AN INDIAN CORPORATION
    You have two cows.
    You worship them.

    A BRITISH CORPORATION
    You have two cows.
    Both are mad.

    AN IRAQI CORPORATION
    Everyone thinks you have lots of cows.
    You tell them that you have none.
    Nobody believes you, so they bomb the crap out of you and invade your country.
    You still have no cows but at least you are now a Democracy.

    AN AUSTRALIAN CORPORATION
    You have two cows.
    Business seems pretty good.
    You close the office and go for a few beers to celebrate.

    A NEW ZEALAND CORPORATION
    You have two cows.
    The one on the left looks very attractive.

    A GREEK CORPORATION
    You have two cows borrowed from French and German banks.
    You eat both of them.
    The banks call to collect their milk, but you cannot deliver so you call the IMF.
    The IMF loans you two cows.
    You eat both of them.
    The banks and the IMF call to collect their cows/milk.
    You are out getting a haircut…

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