भूत, वर्तमान और भविष्य की अनुभूति के बीच सही संतुलन जरूरी है। अतीत मिट जाए तो हम शब्दहीन, वर्तमान खो जाए तो अवसादग्रस्त और भविष्य न दिखे तो निर्जीव मशीन बन जाते हैं।और भीऔर भी

हम सभी ब्रह्म हैं। एक से अनेक होने, एक को अनेक करने की कोशिश करते हैं। नहीं कर पाते तो सिर धुनते हैं। नहीं भान कि दूसरों को मान दिए बिना, दूसरों का साथ लिए बिना अनेक नहीं हो सकते।और भीऔर भी

देश से भ्रष्टाचार मिटाने के दो सूत्र – एक, राजनीतिक दलों की फंडिंग की पारदर्शी व्यवस्था हो। दो, चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली अपनाई जाए ताकि व्यक्ति के बजाय लोग पार्टी को तरजीह दें।और भीऔर भी

हर कोई अपनी ज़िंदगी जीने को स्वतंत्र है। लेकिन जैसे ही आप देश या समाज की सामूहिक जिम्मेदारी संभालते हैं, आपकी निजता खत्म हो जाती है, अपने निजत्व को निर्वासित करना पड़ता है।और भीऔर भी

किताबों में अच्छी बातें पढ़ते हैं। ज्ञान की अच्छी बातें सुनते हैं। लेकिन चंद दिनों में वे उड़ जाती हैं। इसलिए क्योंकि दिमाग तो काम की जरूरी बातें ही सजोकर रखता है। इसलिए पहले जरूरत बढ़ाओ बंधुवर!और भीऔर भी

चमत्कार से इनकार नहीं। लॉटरी से भी कोई इनकार नहीं। लेकिन अक्सर चमत्कार का इंतजार करते-करते पूरी जिंदगी बीत जाती है। इस बीच चमत्कार और लॉटरी का धंधा करनेवाले जरूर मालामाल हो जाते हैं।और भीऔर भी

जिंदगी में जितना वॉयड होता है, चाहतें उतनी लाउड होती हैं। धंधेबाज हमारे इस रीतेपन को अमानवीय होने की हद तक भुनाते हैं। उन्हें बेअसर करना है तो हमें अपना रीतापन भरना होगा, चाहतें अपने-आप सम हो जाएंगी।और भीऔर भी

जीवन की कमियां, कमजोरियां, अधूरापन जब भावनाओं का आधार होता है तो वे अच्छी होती हैं, सच्ची होती हैं। लेकिन अच्छी-सच्ची भावनाएं अक्सर विचारधाराओं की सूली चढ़ जाती हैं। ये कतई अच्छी बात नहीं है।और भीऔर भी

कोमा में जाने या मरने पर हम विचार-शून्य, भाव-शून्य, शब्द-शून्य हो जाते हैं। लेकिन क्या जीते-जी ऐसा संभव है जब हमें सिर्फ नाद सुनाई दे, जब हम सारे शब्दों-विकारों से मुक्त होकर दुनिया को देख सकें?और भीऔर भी

अब कहें, तब कहें, कब कहें, कैसे कहें – हम इसी उधेड़बुन में लगे रहे। वो शान से आया। तपाक से हाथ पकड़ा। बोला भी कुछ नहीं। बस, आंखों से हल्का-सा इशारा किया और वह उसके साथ झूमते-झामते चली गई।और भीऔर भी