परदादा से नाती तक की कड़ियां अगर जुड़ी रहें तो नाती को बाप-दादा से लेकर परदादा तक की उम्र लग जाती है और वह दीर्घायु हो जाता है। इसी निरंतरता को हम चाहें तो अपनी लंबी उम्र का सूत्र बना सकते हैं।और भीऔर भी

देश कहां से कहां पहुंचता जा रहा है और हम वहीं के वहीं अपनी चौहद्दी में सिमटे हैं! देश का काम हमारे बगैर चल सकता है, लेकिन हमारा काम उसके बगैर नहीं। इसलिए दौड़कर देश का साथ पकड़ना जरूरी है।और भीऔर भी

कोई भी काम इतना नया नहीं होता कि थोड़ा-बहुत सीखने के लिए पुराने अनुभव न हों और कोई भी काम इतना पुराना नहीं होता कि कोई खब्ती दावा कर सके कि यह काम तो हम बहुत पहले आजमा कर फेंक चुके हैं।और भीऔर भी

निर्वात कभी स्थाई नहीं होता, न अंदर न बाहर। वो बस कुछ पलों के लिए होता है क्योंकि बनते ही उसे भरने का तेज क्रम शुरू हो जाता है। वायुमंडल में हवाओं का तूफान आ जाता है तो समुंदर में लहरों का भूचाल।और भीऔर भी

ये अहम, ये ईगो हमारे अंदर का ऐसा ब्लैक होल है जो हमारा सब कुछ सोख कर बैठा रहता है। भ्रमों के जंगल से, माया के जाल से हमें निकलने नहीं देता। निकलने की कोशिश करते ही खींचकर पुनर्मूषको भव कर देता है।और भीऔर भी

औरों से झूठ बोलते-बोलते हम एक दिन अपने से भी झूठ बोलने लगते हैं। वो दिन हमारे लिए सबसे ज्यादा दुखद होता है क्योंकि तब हमारा मूल वजूद ही हमारा साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़कर चला जाता है।और भीऔर भी

महान लोग कहीं आसमान से नहीं टपकते। वे हमारे-आप जैसे ही लोग होते हैं। दिक्कत यह है कि हम महानता की आभा में खोकर छाया के पीछे भागते रहते हैं। महान बनने के परिणाम को देखते हैं, प्रक्रिया को नहीं।और भीऔर भी

किताबी ज्ञान पिछली पीढ़ियों के अनुभवों का निचोड़ है। लेकिन वह तब तक किसी काम का नहीं, जब तक उसे आज के संदर्भ में पचा न लिया जाए। नहीं तो वह व्यक्ति को वायु के रोगी की तरह असहज बना देता है।और भीऔर भी

हम घरों के कोने-अँतरों में छोटी-बड़ी तमाम चीजों को बचाकर रखने के आदी हो गए हैं। सोचते हैं कि क्या पता, कभी काम आ जाए, जबकि सोचना चाहिए कि क्या इसके बिना हमारा काम चल सकता है।और भीऔर भी

कहा जाता है कि मेहनत से किसी को कुछ भी मिल सकता है। लेकिन सच यह है कि अकेली मेहनत से आप अपने सामाजिक-आर्थिक ऑरबिट या वर्ग की हद तक ही बढ़ सकते हैं। उससे ज्यादा नहीं।और भीऔर भी