हाथ पर हाथ धरे बैठना अपने विनाश को न्यौता देना है क्योंकि जब तक आप कुछ करते हो तभी तक जिंदा हो, नहीं तो नकारात्मक शक्तियां आपको खाना शुरू कर देती हैं। भव्य महल भी खंडहर बन जाते हैं।और भीऔर भी

मैं अजर हूं, अमर हूं, अनंत हूं। तुम मुझे क्या बांटोगे? मैंने खुद को दिन-रात और ऋतुओं में बांटा है। तुमने तो महीने और साल बनाकर मेरा अनुकरण भर किया है। मैं बंटता नहीं, मैं बंधता नहीं। मैं समय हूं।और भीऔर भी

ज़िंदगी में पुराने का जाना और नए का आना रिले रेस की तरह नहीं, समुद्र की लहरों की तरह चलता है। लेकिन हम पुरानी लहर के भीतर बन रही नई लहर को नहीं देख पाते और खामखां परेशान हो जाते हैं।और भीऔर भी

जो हुआ, जैसे हुआ, उसे वैसा ही होना था। पछताना क्या? हमारे साथ नहीं होता तो किसी और के साथ होता। बस, नाम बदल जाता। घात-प्रतिघात से ही जीवन बनता है और हमारे कर्मों से संवरता है।और भीऔर भी

आशा बड़ी बलवान है। इससे भरे हुए लोग बडी़ से बड़ी विघ्न-बाधा से जूझ सकते हैं। लेकिन जो इससे वंचित हैं, वे बेजान ठूठ की तरह एक जगह पड़े रहते हैं और सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं कर पाते।और भीऔर भी

सब धान बाइस पसेरी तौलनेवाले पंसारी की दुकान चला सकते हैं, नया नहीं ला सकते। समाज, संस्था या कहीं भी बदलाव लाना हो तो पहले उसके आज को बड़ी बारीकी से गहना-समझना पड़ता है।और भीऔर भी

ये वर्ग और वर्ग संघर्ष संक्रमण काल की चीजें हैं। शांति काल आते ही व्यक्ति ही अंतिम सत्य बन जाता है और सामाजिक व्यवस्था एक-दूसरे को निचोड़ने-खसोटने का जंगल राज बन जाती है।और भीऔर भी

ऐसा क्यों कि हम जो भी बनाते हैं वो भस्मासुर बन हमारा ही नाश करने पर उतारू हो जाता है? नेता से लेकर अभिनेता और भगवान तक हम ही बनाते हैं। लेकिन वो मालिक बन बैठता है और हम गुलाम।और भीऔर भी

यह सच है कि अंग्रेजी भाषा ने हम भारतीयों को दुनिया से लेने के काबिल बना रखा है। लेकिन आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी सीखने का दबाव न होता तो शायद हम लेने के बजाय दुनिया को दे रहे होते।और भीऔर भी

आठ घंटे सोना, आठ घंटे काम करना और आठ घंटे मौज-मस्ती। दिन के चौबीस घंटे का यह आदर्श विभाजन है। ऐसा संतुलन बन जाता तो मजा आ जाता। लेकिन आदर्श भी कभी सच होते हैं भला!और भीऔर भी