आशा की शक्ति
आशा बड़ी बलवान है। इससे भरे हुए लोग बडी़ से बड़ी विघ्न-बाधा से जूझ सकते हैं। लेकिन जो इससे वंचित हैं, वे बेजान ठूठ की तरह एक जगह पड़े रहते हैं और सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं कर पाते।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
आशा बड़ी बलवान है। इससे भरे हुए लोग बडी़ से बड़ी विघ्न-बाधा से जूझ सकते हैं। लेकिन जो इससे वंचित हैं, वे बेजान ठूठ की तरह एक जगह पड़े रहते हैं और सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं कर पाते।और भीऔर भी
सब धान बाइस पसेरी तौलनेवाले पंसारी की दुकान चला सकते हैं, नया नहीं ला सकते। समाज, संस्था या कहीं भी बदलाव लाना हो तो पहले उसके आज को बड़ी बारीकी से गहना-समझना पड़ता है।और भीऔर भी
ये वर्ग और वर्ग संघर्ष संक्रमण काल की चीजें हैं। शांति काल आते ही व्यक्ति ही अंतिम सत्य बन जाता है और सामाजिक व्यवस्था एक-दूसरे को निचोड़ने-खसोटने का जंगल राज बन जाती है।और भीऔर भी
यह सच है कि अंग्रेजी भाषा ने हम भारतीयों को दुनिया से लेने के काबिल बना रखा है। लेकिन आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी सीखने का दबाव न होता तो शायद हम लेने के बजाय दुनिया को दे रहे होते।और भीऔर भी
आठ घंटे सोना, आठ घंटे काम करना और आठ घंटे मौज-मस्ती। दिन के चौबीस घंटे का यह आदर्श विभाजन है। ऐसा संतुलन बन जाता तो मजा आ जाता। लेकिन आदर्श भी कभी सच होते हैं भला!और भीऔर भी
देश में असली विकास व सच्चे लोकतंत्र की स्थितियां तब बनेंगी जब जीवन में आपकी कामयाबी इससे नहीं तय होगी कि आप किसे जानते हैं, बल्कि इससे तय होगी कि आप क्या जानते हैं।और भीऔर भी
सब कुछ चलायमान हो तो रुक कर योजना बनाने की फुरसत कैसे मिल सकती है! रुके नहीं कि आप पीछे छूट गए। समय के साथ चलना है तो चलते-चलते योजना बनाने का हुनर सीखना पड़ेगा।और भीऔर भी
कुछ खेल ऐसे होते हैं जिनमें आपकी जीत पूरे देश व समाज की जीत होती है। तो, टुच्चे खेल काहे खेलें! हमें तो ऐसे काम में खुद को लगाना चाहिए जिसमें हमारे जीतने पर करोड़ों चेहरे खिल जाएं।और भीऔर भी
निरंतर नए ऑरबिट में जाने की कोशिश करना इंसान का मूल स्वभाव है। इसलिए हम रूटीन से ऊब जाते हैं। लेकिन नए ऑरबिट में जाकर भी नए चक्र में बंधना पड़ता है। चक्र के इस चक्कर से मुक्ति नहीं।और भीऔर भी
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