मनोरंजन के इतने साधन, फिर भी सांस्कृतिक शून्य? चैनल पर चैनल सर्फ करते जाने का यह कैसा चटोरापन? ओस प्यास नहीं बुझाती, बाजार कभी शून्य नहीं भरता। इसे तो हमें खुद ही भरना होगा।और भीऔर भी

दुनिया के हर नए-पुराने विचार पर इंसान की छाप है। जिस तरह सुदूर पहाड़ों से धारा के साथ बहता आ रहा पत्थर नीचे पहुंचकर शिव बन जाता है उसी तरह इंसानी विचार भी एक दिन ईश्वरीय बन जाते हैं।और भीऔर भी

कोई हमारा हालचाल पूछ लेता है। सलाम कर देता है। और, हम अपने बारे में भ्रम के शिकार हो जाते हैं। नहीं जानते कि सामने वाला अपनी जरूरत से जोड़कर हमें देखता है। जरूरत खत्म तो मान भी खत्म।और भीऔर भी

हम अलग, तुम अलग। हर जीव अलग, जंतु अलग। पर आकाश वही है, धरती वही है, सारी प्रकृति वही है। अणु वही, परमाणु वही है। फिर, कोई एक नियम भी तो होगा जिससे सारे नियम चलते होंगे!और भीऔर भी

यह अवचेतन में समाए अधूरेपन के बीच पूर्णता की तलाश है जो हम हमेशा नए से नया खोजते रहते हैं। हर नई चीज को देखकर पूछते हैं – इसमें नया क्या है? नए की यह निरंतर तलाश ही हमें ज़िंदा रखती है।और भीऔर भी

ज़िंदगी की तीखी चढ़ाई में हमेशा आस्था की जरूरत पड़ती है जिसके सहारे आप अंदर-बाहर की हर प्रतिकूलता से निपटते हैं। इस आस्था का प्रतीक गुरु, मित्र, देव, पेड़ या आपका कोई प्रिय भी हो सकता है।और भीऔर भी

सही समझ के लिए सत्ता से दो हाथ की दूरी जरूरी है। सत्ता आपकी आंखों पर परदा डाल देती है। ऐसा मतिअंध बना देती है कि आपको बस अपना ही अपना दिखता है, बदलता सच नहीं दिखता।और भीऔर भी

नैतिकता की दुहाई कमजोर लोग देते हैं। धर्म, समाज व राजनीति के ठेकेदारों के लिए यह लोगों को भरमाने का एक जरिया है जिसका नाम जपते हुए वे खुद जघन्य से जघन्य काम किए जाते हैं।और भीऔर भी

मानव समाज कोई गेहूं का बोरा नहीं है जो चार दाने उठाकर सारे माल की गुणवत्ता तय कर दी जाए। यहां तो अंतिम आदमी भी इतना अनोखा हो सकता है कि सारे सर्वेक्षण का नतीजा ही पलट जाए।और भीऔर भी

अक्सर जिन्हें हम जानते हैं, उन्हें ही पूरी दुनिया समझ बैठते हैं। उनकी नकारात्मक प्रतिक्रिया से टूट जाते हैं। नहीं जानते कि जो लहर हमारे अंदर उठी है उसका स्रोत तो हमारे दायरे के बाहर का सागर है।और भीऔर भी