सहजता ही समाधि
सहजता का ही दूसरा नाम समाधि है। चालाकी हमें असहज बनाती है। लेकिन बुद्धि से हम हर चालाकी को काटकर सहज बन सकते हैं। इतने सहज कि लोगों की चालाकी पर हमें गुस्सा नहीं, हंसी आएगी।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
सहजता का ही दूसरा नाम समाधि है। चालाकी हमें असहज बनाती है। लेकिन बुद्धि से हम हर चालाकी को काटकर सहज बन सकते हैं। इतने सहज कि लोगों की चालाकी पर हमें गुस्सा नहीं, हंसी आएगी।और भीऔर भी
अलग-थलग कोने में बैठकर ज्ञान बघारना, जुमले उछालना और फतवे फेंकना बड़ा आसान है। लेकिन सत्ता, शोहरत व समृद्धि की जंग में पहुंचते ही ऐसे लोग लहूलुहान चूजों की तरह भाग खड़े होते हैं।और भीऔर भी
रोजमर्रा की उलझनों को नहीं सुलझाते तो एक दिन ये उलझनें आपको ही ‘सुलझा’ देती हैं। तब आप किस्मत का रोना रोते हैं, जबकि थोड़े तनाव से बचने के लिए ये हालात आपने खुद ही पैदा किए होते हैं।और भीऔर भी
वह जमाना अब नहीं रहा, जब कम बोलना अच्छा माना जाता था। आजकल तो सफलता उन लोगों के कदम चूमती है, जो बेहतरीन शब्दों में बेहतरीन ढंग से अपने काम का बखान कर सकते हैं।और भीऔर भी
संविधान में संशोधन का अधिकार सिर्फ सरकार को है, जनता को नहीं। जनता जब संविधान में बदलाव की बात करती है तो राष्ट्रद्रोही तक करार दी जाती है। फिर, आखिर किन गणों का गणतंत्र है यह?और भीऔर भी
आदमी को वहीं से उठना चाहिए जहां वह गिरता है। जीवन में यही नियम लागू होता है। जो गिरते कहीं और हैं और उठना कहीं और से चाहते हैं वे कभी खड़े नहीं हो पाते, दौड़ना तो बहुत दूर की बात है।और भीऔर भी
सोचिए, आपके फैसले कोई दूसरा कैसे ले सकता है! अपने फैसले खुद लेने की आदत डालें और उसकी जवाबदेही भी लें। तभी आप गलत फैसलों से सही फैसलों तक पहुंचने का हुनर सीख पाएंगे।और भीऔर भी
किराये का मकान है। यहां अपनी निशानियां पीछे छोड़कर क्यों जाने का? न जाने कैसे लोग आएं, इनके साथ क्या सलूक करें, क्या पता! इसलिए सब कुछ समेट लेने का, एक-एक निशान मिटा देने का।और भीऔर भी
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