काम पर जाना अच्छा नहीं लगता तो समझ लीजिए कि आप अपने अंदर की धारा नहीं, बल्कि समाज के दबाव में काम कर रहे हैं। ऐसे में खास आपके लिए निर्मित शक्तियां भी आपकी मदद नहीं कर पातीं।और भीऔर भी

सूरज यह सोचकर नहीं निकलता कि कमल को खिलाना है। चांद इसलिए नहीं उगता कि कुमुदिनी को हंसाना है। बादल भी बरसात के लिए नहीं बनते। यह तो चक्र है जो भीतर ही भीतर चलता है, बाहर नहीं।और भीऔर भी

हम अपनी ही आभा की झूठी चकाचौंध और भ्रमों के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि असली सच को देख नहीं पाते। वह सच, जो हम से पूरी तरह स्वतंत्र है, जिससे हमारी पूरी दुनिया संचालित होती है।और भीऔर भी

कुछ कर गुजरने की ज्वाला को अपने अंदर धीमा मत पड़ने दीजिए। फिर देखिए कि बुरे से बुरे हालात और वक्त भी आपको धूमिल नहीं कर पाएंगे। यहां तक कि उम्र भी आपकी आभा को मंद नहीं कर पाएगी।और भीऔर भी

निरंकुशता और अविश्वास के बीच ही असत्य पलता है। भरोसे और भाईचारे के परिवेश में सत्य पनपता है। असत्य पर सत्य की जीत कभी आसानी से नहीं होती। लंबे संघर्ष में असत्य का संहार करना पड़ता है।और भीऔर भी

जिसकी दुनिया बसी-बसाई है, सब कुछ जमा-जमाया है, वो भ्रमों में रहना गवारा कर सकता है। लेकिन जिसे सब कुछ नए सिरे से बनाना है, जमाना है, भ्रम उसके लड़ने की ताकत को कमजोर कर देते हैं।और भीऔर भी

जिस तरह कमल-दंड पानी की सतह के साथ बढ़ने के बाद छोटा नहीं हो सकता, उसी तरह ज्ञान पाने के बाद हम किसी अज्ञानी की तरह चहक नहीं सकते। शायद इसीलिए कहते हैं कि ज्ञान ही दुख का मूल कारण है।और भीऔर भी

अकेले दम पर धन-दौलत, पद, प्रतिष्ठा और शोहरत सब पाई जा सकती है। लेकिन पारिवारिक संबंधों की रागात्मकता के बिना वो खुशी नहीं मिल सकती है जो क्षीर सागर में विराजे विष्णु को हासिल थी।और भीऔर भी

जब कभी आप किसी को देते हैं तो आप उसकी नजर में ही नहीं, खुद की नजर में भी बहुत बड़े बन जाते हो। कुछ पल के लिए सही, दाता बनने का इकलौता सुख भी लेते जाने के अनंत सुखों पर भारी पड़ता है।और भीऔर भी

खुदकुशी का ख्याल मन में तभी आता है जब आप देने की नहीं, पाने की मानसिकता में जीते हैं। सोचना शुरू कर दीजिए कि आप औरों को क्या दे सकते हैं। फौरन मरने का ख्याल दुम दबाकर भाग जाएगा।और भीऔर भी