ज्ञान तो विशाल सागर नहीं, अक्षय पात्र है। पुराना निकालो, नया बनता जाता है। कभी शेष नहीं होता। जब तक जीवन है, तब तक मन खदबद करता रहता है और ज्ञान का नया सत्व निकलता रहता है।और भीऔर भी

जीवन में एक ही चीज निश्चित है। वो है मौत। बाकी सब कुछ अनिश्चित है। ऐसे में भविष्य से घबराने की क्या जरूरत! क्योंकि इन अनिश्चितताओं को नाथकर अपना भविष्य तो हम खुद ही बना सकते हैं।और भीऔर भी

हम सभी के अंदर एक चुम्बक है जो माफिक चीजों को खींचकर लगातार एक पैटर्न बनाता रहता है। इसी पैटर्न से हमारा व्यक्तित्व बनता है, जबकि इसका एक अंश शब्दों का आकार पाकर विचार बन जाता है।और भीऔर भी

पहले स्वीकार तो करें कि आप सब कुछ नहीं जानते, तभी जाकर नया जानने की प्रक्रिया शुरू होगी। नहीं तो आप हर नए ज्ञान की हामी अपने पुराने ज्ञान से भराते रहेंगे और गाड़ी जहां की तहां ही पड़ी रहेगी।और भीऔर भी

काम पर जाना अच्छा नहीं लगता तो समझ लीजिए कि आप अपने अंदर की धारा नहीं, बल्कि समाज के दबाव में काम कर रहे हैं। ऐसे में खास आपके लिए निर्मित शक्तियां भी आपकी मदद नहीं कर पातीं।और भीऔर भी

सूरज यह सोचकर नहीं निकलता कि कमल को खिलाना है। चांद इसलिए नहीं उगता कि कुमुदिनी को हंसाना है। बादल भी बरसात के लिए नहीं बनते। यह तो चक्र है जो भीतर ही भीतर चलता है, बाहर नहीं।और भीऔर भी

हम अपनी ही आभा की झूठी चकाचौंध और भ्रमों के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि असली सच को देख नहीं पाते। वह सच, जो हम से पूरी तरह स्वतंत्र है, जिससे हमारी पूरी दुनिया संचालित होती है।और भीऔर भी

कुछ कर गुजरने की ज्वाला को अपने अंदर धीमा मत पड़ने दीजिए। फिर देखिए कि बुरे से बुरे हालात और वक्त भी आपको धूमिल नहीं कर पाएंगे। यहां तक कि उम्र भी आपकी आभा को मंद नहीं कर पाएगी।और भीऔर भी

निरंकुशता और अविश्वास के बीच ही असत्य पलता है। भरोसे और भाईचारे के परिवेश में सत्य पनपता है। असत्य पर सत्य की जीत कभी आसानी से नहीं होती। लंबे संघर्ष में असत्य का संहार करना पड़ता है।और भीऔर भी

जिसकी दुनिया बसी-बसाई है, सब कुछ जमा-जमाया है, वो भ्रमों में रहना गवारा कर सकता है। लेकिन जिसे सब कुछ नए सिरे से बनाना है, जमाना है, भ्रम उसके लड़ने की ताकत को कमजोर कर देते हैं।और भीऔर भी