परमार्थ में ही स्वार्थ
हम लेना ही लेना चाहते हैं, देना नहीं चाहते। यह आदिम सोच है। सामाजिक निर्भरता के युग में दूसरों को देने से ही खुद को मिलता है। कारोबार का मंत्र भी यही है। दूसरे को आपसे कुछ मिलेगा, तभी तो वह आपको देगा।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
हम लेना ही लेना चाहते हैं, देना नहीं चाहते। यह आदिम सोच है। सामाजिक निर्भरता के युग में दूसरों को देने से ही खुद को मिलता है। कारोबार का मंत्र भी यही है। दूसरे को आपसे कुछ मिलेगा, तभी तो वह आपको देगा।और भीऔर भी
हम सब के पास दो टाइम मशीन हैं। एक मशीन हमें समय में पीछे तक ले जाती है, सुदूर अतीत में पहुंचा देती है, उसे हम याददाश्त कहते हैं। दूसरी टाइम मशीन हमें भविष्य में उड़ा ले जाती है, उसे हम ख्वाब कहते हैं।और भीऔर भी
छोटा-सा दायरा। चंद लोगों की वाहवाह। अपनी ही छवियों पर मंत्रमुग्ध। ये सब हमारे अंदर ऐसी गर्द जमाते रहते हैं कि हमें कुछ का कुछ दिखने लगता है। इसलिए दिमाग पर बराबर वाइपर चलाते रहना जरूरी है।और भीऔर भी
पानी बहता नहीं तो सड़ता है। यही बात पैसे और बचत पर भी लागू होती है। बांधकर रखेंगे तो वह घुटता रहेगा, क्षीण होता रहेगा। पैसे को पानी की तरह बहाना गलत है। लेकिन उसे सही माध्यमों में निवेश करना जरूरी है।और भीऔर भी
अगर कोई नीति कभी भी लागू नहीं हो पा रही है तो पक्की बात है कि उस नीति में कोई बुनियादी खामी है। इसलिए जो कानून लागू नहीं हो पा रहे हैं, उनमें यह तलाशने की जरूरत है कि उनका नट-बोल्ट कहां से ढीला है।और भीऔर भी
हम शरीर से लिबर्टी लेते रहे, मनमर्जी करते रहे। लेकिन यही शरीर जब हमसे लिबर्टी लेने लगता है, तब हमारी सारी लिबर्टी हवा हो जाती है। अरे भाई, पहले से ही संयम नियम माना होता तो ये नौबत ही क्यों आती।और भीऔर भी
अंधविश्वासी व्यक्ति को अपार धन के बावजूद कभी भी वो खुशी नहीं मिल सकती है जो किसी उन्मुक्त मन को मिलती है। हर खुशी का स्रोत प्रकृति है और प्रकृति उसे ही देती है जो उससे डरता नहीं, दो-दो हाथ करता है।और भीऔर भी
अकेले बस मरा जा सकता है, जिया नहीं जा सकता। जीना और काम तो हमेशा समूह में होता है, टीम में होता है। काम टीम करती है। श्रेय, नाम और वाहवाही नेता को मिलती है। लेकिन इसे सही तो नहीं कहा जा सकता।और भीऔर भी
शरीर जरूरत से ज्यादा नहीं पचा सकता। इसी तरह कोई भी शख्स अपने पास जरूरत से बहुत-बहुत ज्यादा नहीं रख सकता। उसे अतिरिक्त संपदा को सामाजिक स्वरूप देना ही पड़ता है। यही प्रकृति का नियम है।और भीऔर भी
प्रकृति में कुछ भी बेकार नहीं जाता। खाद बन जाता है। इसी तरह समाज में जो भी खुद को मिसफिट पाते हैं, वे असल में कल के सृष्टि बीज होते हैं। इन्हें हालात से घबराने के बजाय कल की तैयारी में जुट जाना चाहिए।और भीऔर भी
© 2010-2025 Arthkaam ... {Disclaimer} ... क्योंकि जानकारी ही पैसा है! ... Spreading Financial Freedom