अध्ययन और अभ्यास
जो चीज जैसी लगती है, वैसी होती नहीं। आंखों के रेटिना पर तस्वीर उल्टी बनती है, दिमाग उसे सीधा करता है। इसी तरह सच समझने के लिए बुद्धि की जरूरत पड़ती है जो अध्ययन, अभ्यास और अनुभव से ही आती है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जो चीज जैसी लगती है, वैसी होती नहीं। आंखों के रेटिना पर तस्वीर उल्टी बनती है, दिमाग उसे सीधा करता है। इसी तरह सच समझने के लिए बुद्धि की जरूरत पड़ती है जो अध्ययन, अभ्यास और अनुभव से ही आती है।और भीऔर भी
शब्दों से परे की सोच!! जब शब्द नहीं था, सिर्फ नाद था, ध्वनियां थीं, तब भी तो इंसान सोचता ही रहा होगा। शब्दों के बिना ज़रा सोचकर देखें कि उस वक्त इंसान कैसे सोचता रहा होगा। बड़ा मज़ा आएगा।और भीऔर भी
किस्मत और भगवान पर हमारा वश नहीं। लेकिन आत्मविश्वास हमारा अपना है। किस्मत और भगवान जब किनारा कर लेते हैं, तब आत्मविश्वास ही काम आता है, हमें संभालता है। इसलिए उसे संभालिए।और भीऔर भी
जब हम व्यक्ति से लेकर समाज और अंदर से लेकर बाहर की प्रकृति के रिश्तों को तार-तार समझ लेते हैं तो हमारी अवस्था क्षीरसागर में शेषनाग की कुंडली पर लेटे विष्णु जैसी हो जाती है। हम मुक्त हो जाते हैं।और भीऔर भी
दुनिया में कुछ भी अकारण नहीं। सब नियमबद्ध है। नियम-विरुद्ध होने पर ही दुर्घटनाएं होती हैं। इसलिए इन नियमों को समझना जरूरी है और नियमों को तर्क पर तर्क, सवाल पर सवाल के बिना नहीं समझा जा सकता।और भीऔर भी
पीछे मुड़कर देखने व अफसोस करने की जरूरत नहीं है क्योंकि ज़िंदगी में कभी भी कुछ भी पीछे नहीं छूटता। न खुशियां, न अवसर, न चुनौतियां। वे भेष बदलकर सामने आती रहती हैं। देखिए तो सही, पहचानिए तो सही।और भीऔर भी
हम लेना ही लेना चाहते हैं, देना नहीं चाहते। यह आदिम सोच है। सामाजिक निर्भरता के युग में दूसरों को देने से ही खुद को मिलता है। कारोबार का मंत्र भी यही है। दूसरे को आपसे कुछ मिलेगा, तभी तो वह आपको देगा।और भीऔर भी
हम सब के पास दो टाइम मशीन हैं। एक मशीन हमें समय में पीछे तक ले जाती है, सुदूर अतीत में पहुंचा देती है, उसे हम याददाश्त कहते हैं। दूसरी टाइम मशीन हमें भविष्य में उड़ा ले जाती है, उसे हम ख्वाब कहते हैं।और भीऔर भी
छोटा-सा दायरा। चंद लोगों की वाहवाह। अपनी ही छवियों पर मंत्रमुग्ध। ये सब हमारे अंदर ऐसी गर्द जमाते रहते हैं कि हमें कुछ का कुछ दिखने लगता है। इसलिए दिमाग पर बराबर वाइपर चलाते रहना जरूरी है।और भीऔर भी
पानी बहता नहीं तो सड़ता है। यही बात पैसे और बचत पर भी लागू होती है। बांधकर रखेंगे तो वह घुटता रहेगा, क्षीण होता रहेगा। पैसे को पानी की तरह बहाना गलत है। लेकिन उसे सही माध्यमों में निवेश करना जरूरी है।और भीऔर भी
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