जीवन की अनिश्चितता
जीवन की राहों पर अनिश्चितता है, अराजकता नहीं। शिक्षा व संस्कार हमें इन राहों पर चलने का ड्राइविंग लाइसेंस दिलाते हैं। हमारा आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। बाकी, अनिश्चितता का थ्रिल हमारा उत्साह बरकरार रखता है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जीवन की राहों पर अनिश्चितता है, अराजकता नहीं। शिक्षा व संस्कार हमें इन राहों पर चलने का ड्राइविंग लाइसेंस दिलाते हैं। हमारा आत्मविश्वास बढ़ाते हैं। बाकी, अनिश्चितता का थ्रिल हमारा उत्साह बरकरार रखता है।और भीऔर भी
जो चला गया, उसका गम क्या? वह चाहे हादसा था या प्रकृति का चक्र, हम उसे रोकने की बात तो दूर, छू तक नहीं सकते। इसलिए जिसका जितना साथ है, हंस बोल कर ही बिताना चाहिए ताकि कोई मलाल न रहे।और भीऔर भी
हाथ पकड़कर खींचने से कोई नहीं जुड़ता। वो तो अंदर की एक ध्वनि होती है जिसे सुनते ही लोग दौड़े चले आते हैं। हाथी एक खास आवाज धीरे से निकालता है और दस किलोमीटर दूर तक के हाथी खिंचे चले आते हैं।और भीऔर भी
कुछ भी स्थाई नहीं। न दुख, न सुख। पौधे पर एक पत्ती इधर तो एक पत्ती उधर। छोटा से छोटा कण भी अपनी धुरी पर अनवरत घूम रहा है। इसलिए अभी कृष्ण पक्ष है तो शुक्ल पक्ष अगला है। यह लीला नहीं, नियम है।और भीऔर भी
आप अपनी बनाई चीज पर फिदा हैं। आपकी निगाह में बहुत कीमत है उसकी। लेकिन इससे क्या होता है? कीमत तो दूसरे की निगाह में होनी चाहिए। दूसरा ही तय करेगा कि आपकी चीज की औकात क्या है, आप नहीं।और भीऔर भी
असत से सत की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर। सब प्रार्थना है। यथार्थ यह है कि हम हर समय असंतुलन से संतुलन की ओर बढते रहते हैं। लेकिन पूर्ण संतुलन तो मृत्यु पर भी नहीं मिलता।और भीऔर भी
बात मन में रखने के कुछ नहीं होगा। कहना जरूरी है। नहीं तो सामनेवाला अपनी दुनिया में मस्त रहेगा और हम अपनी दुनिया में। उसकी तर्क पद्धति व संस्कार भिन्न हैं। वह हमारी बात अपने-आप नहीं समझ सकता।और भीऔर भी
काम पर किसी का नाम नहीं लिखा रहता। आप चूके तो कोई और कर लेगा। यह नियम साहित्य सृजन जैसे विशिष्ट काम पर भी लागू होता है। इसलिए नाम पाना है कि काम को कल पर नहीं टालना चाहिए।और भीऔर भी
बात सोची। आजमाई नहीं। उड़ गई। क्या फायदा? ज्ञान को व्यवहार की कसौटी पर कसना जरूरी है। इसी से उसके सही या गलत होने का पता भी चलता है। नहीं तो हम भ्रम में ही पड़े रहते हैं, खुद को सही माने बैठे रहते हैं।और भीऔर भी
छोटे थे तो मां के हाथों का स्पर्श हमें संवारता था। सुरक्षा की अभेद्य दीवार बन जाता था। इसकी गोद से उसकी गोद हम खिलखिलाते थे। बड़े होते जाते हैं, स्पर्श घटता जाता है और हम असुरक्षित होते चले जाते हैं।और भीऔर भी
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