कुछ भी स्थाई नहीं। न दुख, न सुख। पौधे पर एक पत्ती इधर तो एक पत्ती उधर। छोटा से छोटा कण भी अपनी धुरी पर अनवरत घूम रहा है। इसलिए अभी कृष्ण पक्ष है तो शुक्ल पक्ष अगला है। यह लीला नहीं, नियम है।और भीऔर भी

आप अपनी बनाई चीज पर फिदा हैं। आपकी निगाह में बहुत कीमत है उसकी। लेकिन इससे क्या होता है? कीमत तो दूसरे की निगाह में होनी चाहिए। दूसरा ही तय करेगा कि आपकी चीज की औकात क्या है, आप नहीं।और भीऔर भी

असत से सत की ओर, अंधेरे से उजाले की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर। सब प्रार्थना है। यथार्थ यह है कि हम हर समय असंतुलन से संतुलन की ओर बढते रहते हैं। लेकिन पूर्ण संतुलन तो मृत्यु पर भी नहीं मिलता।और भीऔर भी

बात मन में रखने के कुछ नहीं होगा। कहना जरूरी है। नहीं तो सामनेवाला अपनी दुनिया में मस्त रहेगा और हम अपनी दुनिया में। उसकी तर्क पद्धति व संस्कार भिन्न हैं। वह हमारी बात अपने-आप नहीं समझ सकता।और भीऔर भी

काम पर किसी का नाम नहीं लिखा रहता। आप चूके तो कोई और कर लेगा। यह नियम साहित्य सृजन जैसे विशिष्ट काम पर भी लागू होता है। इसलिए नाम पाना है कि काम को कल पर नहीं टालना चाहिए।और भीऔर भी

बात सोची। आजमाई नहीं। उड़ गई। क्या फायदा? ज्ञान को व्यवहार की कसौटी पर कसना जरूरी है। इसी से उसके सही या गलत होने का पता भी चलता है। नहीं तो हम भ्रम में ही पड़े रहते हैं, खुद को सही माने बैठे रहते हैं।और भीऔर भी

छोटे थे तो मां के हाथों का स्पर्श हमें संवारता था। सुरक्षा की अभेद्य दीवार बन जाता था। इसकी गोद से उसकी गोद हम खिलखिलाते थे। बड़े होते जाते हैं, स्पर्श घटता जाता है और हम असुरक्षित होते चले जाते हैं।और भीऔर भी

अगर आपके पास विचार ही विचार है, लेकिन आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो आप दिवास्वप्न में जी रहे हैं। आप अगर बिना किसी विचार या दृष्टि के काम किए जा रहे हैं तो वह एक दिन दुःस्वप्न साबित होगा।और भीऔर भी

अनंत चुम्बकीय क्षेत्रों से घिरे हैं हम। इन्हीं में से एक चुम्बकीय क्षेत्र हमारा भी  है। इन्हीं के बीच के आकर्षण-विकर्षण से फूल से लेकर विचार तक खिलते हैं। उनमें सिमिट्री, संतुलन और सौंदर्य पैदा होता है।और भीऔर भी

जिंदगी जिनके लिए सिर्फ जीते चले जाने का नाम है, उनको कहां कभी इससे किसी तरह का गिला-शिकवा होनेवाला है। इसीलिए एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जानवर कभी आत्महत्या नहीं करते।और भीऔर भी