अगर आपके पास विचार ही विचार है, लेकिन आप हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो आप दिवास्वप्न में जी रहे हैं। आप अगर बिना किसी विचार या दृष्टि के काम किए जा रहे हैं तो वह एक दिन दुःस्वप्न साबित होगा।और भीऔर भी

अनंत चुम्बकीय क्षेत्रों से घिरे हैं हम। इन्हीं में से एक चुम्बकीय क्षेत्र हमारा भी  है। इन्हीं के बीच के आकर्षण-विकर्षण से फूल से लेकर विचार तक खिलते हैं। उनमें सिमिट्री, संतुलन और सौंदर्य पैदा होता है।और भीऔर भी

जिंदगी जिनके लिए सिर्फ जीते चले जाने का नाम है, उनको कहां कभी इससे किसी तरह का गिला-शिकवा होनेवाला है। इसीलिए एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जानवर कभी आत्महत्या नहीं करते।और भीऔर भी

हमने अपनी-अपनी खोली, अपने-अपने कोटर बना रखे हैं और उसी को सारी दुनिया माने बैठे रहते हैं। लेकिन दुनिया तो बहुत व्यापक और विविधत है। हमारे ऊपर है कि हम उसके कितने हिस्से को आत्मसात कर पाते हैं।और भीऔर भी

संकट में धैर्य ही काम आता है। घबराने पर भगवान भी हमसे किनारा कर लेता है क्योंकि वो तो और कुछ नहीं, हमारे अंदर की ही छाया है। और… अशांत जल में कभी भी साफ छाया नहीं बनती।और भीऔर भी

चीज हमारी आंखों के सामने रहती है, पहुंच में रहती है, फिर भी नहीं दिखती क्योंकि हमें उसके होने का भान ही नहीं होता। भान होता भी है तो उसे गलत जगह खोजते रहते हैं। कस्तूरी कुंडलि बसय, मृग ढूंढय बन मांहि।और भीऔर भी

स्थिरता आभासी है। होती नहीं, दिखती है। इस समूची सृष्टि में स्थिरता जैसी कोई चीज नहीं है। सब कुछ चल रहा है। बन रहा है या मिट रहा है। ठहर गए तो समझिए कि हम अपनी उल्टी गिनती खुद शुरू कर रहे हैं।और भीऔर भी

चिढ़ना और खीझना छींकने और खांसने जैसी आम बात है। लेकिन चिढ़चिढ़ापन जब आपके स्वभाव का स्थाई भाव बन जाए तब जरूर सोचिए कि आपने अंदर और बाहर के किन तारों को अनसुलझा रख छोड़ा है।और भीऔर भी

लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई और समय – इन चार विमाओं में सबसे बलवान है समय। हर पल बदलती दुनिया के मूल में यही है। जो कोई इस समय को साध लेता है वह अपने दौर का सिद्ध बन जाता है।और भीऔर भी

पौधे को आप मिट्टी व खाद-पानी ही दे सकते हैं। उस पर बाहर से फूल-पत्तियां नहीं चिपका सकते। यही बात इंसानों पर लागू होती है। अंतर बस इतना है कि शिक्षा व संस्कार से इंसान के अंदरूनी तत्व भी बदले जा सकते हैं।और भीऔर भी