परिवार के बिना
अकेले दम पर धन-दौलत, पद, प्रतिष्ठा और शोहरत सब पाई जा सकती है। लेकिन पारिवारिक संबंधों की रागात्मकता के बिना वो खुशी नहीं मिल सकती है जो क्षीर सागर में विराजे विष्णु को हासिल थी।और भीऔर भी
देने का सुख
जब कभी आप किसी को देते हैं तो आप उसकी नजर में ही नहीं, खुद की नजर में भी बहुत बड़े बन जाते हो। कुछ पल के लिए सही, दाता बनने का इकलौता सुख भी लेते जाने के अनंत सुखों पर भारी पड़ता है।और भीऔर भी
खुदकुशी की काट
खुदकुशी का ख्याल मन में तभी आता है जब आप देने की नहीं, पाने की मानसिकता में जीते हैं। सोचना शुरू कर दीजिए कि आप औरों को क्या दे सकते हैं। फौरन मरने का ख्याल दुम दबाकर भाग जाएगा।और भीऔर भी
एकतरफा प्यार
अच्छा काम किया जाए और उसका प्रचार न किया जाए तो वह एकतरफा प्यार जैसा है जिसका अंत दुख, अफसोस और एकाकीपन में ही होता है। अरे! सामने वाले को पता तो चले कि आप उससे प्यार करते हैं।और भीऔर भी
सर्वज्ञ नहीं, ढोंगी
जो लोग इस दुनिया में सब कुछ जानने का दावा करते हैं, उनसे बड़ा ढोंगी कोई हो नहीं सकता। उनका ढोंग किसी दूसरे के भले के लिए नहीं, बल्कि अपनी सत्ता बनाने और धंधा चलाने के लिए होता है।और भीऔर भी
समय से कोई होड़ नहीं
समय तो यंत्रवत चलता है। हमने ही उसे नैनो सेकंड से लेकर साल तक के पैमाने में कसा है। अपने जीवन को हम जन्मदिन के चक्र में कसते हैं। लेकिन यह हमारा अपना चक्र है। समय से हमारी कोई होड़ नहीं।और भीऔर भी
समाज बिचौलिया
हमारी खुशी का मूल स्रोत प्रकृति है। समाज तो बस बिचौलिया है जो बनने-बनते हजारों साल में बना है। इस बात को समझकर हम मूल प्रकृति के जितना करीब जाएंगे, हमारी खुशी उतनी बढ़ती जाएगी।और भीऔर भी
कर्म सर्वोच्च
भावनाएं माहौल बनाती हैं। विचार ताकत देते हैं। हमारा कर्म उसे संगत निष्कर्ष तक पहुंचाता है। भावना से लेकर विचार तक कर्म की सेवा के लिए हैं। कर्म सर्वोच्च है। इस तथ्य को मान लेने में हर्ज ही क्या है!और भीऔर भी
