सपनों की तरह हमारी अंतःप्रेरणा भी कहीं आसमान से नहीं टपकती। वह हमारे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से संचित अनुभवों से निकलती है। इसलिए कोई अदृश्य प्रभाव जान उसे हमेशा सही मानने का कोई तुक नहीं है।और भीऔर भी

माना कि इच्छाएं ही दुख का मूल कारण हैं। अमीर से अमीर शख्स भी और ज्यादा पाने के चक्कर में दुखी रहता है। लेकिन इच्छाएं है, तभी तो जीवन है। कला व ज्ञान-विज्ञान का स्रोत भी तो इच्छाएं ही हैं।और भीऔर भी

कमजोर, कायर, काहिल, नाकारा, हवाबाज़ कहलाना किसको अच्छा लगता है। गालियों जैसी चोट करते हैं ये शब्द। लेकिन अगर कोई कह रहा है तो कुछ तो होगा। थोड़ा ठहरकर सोचने में क्या हर्ज है?और भीऔर भी

बीच की राह नहीं। या तो अपना स्वार्थ या औरों का हित। दोनों ही सही हैं। एक आज तो दूसरा कल के लिए। दिक्कत उनके साथ होती है जो न तो अपना स्वार्थ समझ पाते हैं और न ही औरों की जरूरत।और भीऔर भी

यहां हर कोई अपने में मस्त है। सबकी अपनी दुनिया, अपना संसार है। उन्हें सुनाना है तो पहले आपको किसी न किसी रूप में सत्ता हासिल करनी पड़ेगी। जब ये सत्ता दिखती है तभी दूसरे आपको सुनते हैं।और भीऔर भी

हम किसी को या तो पूरा सही मान लेते हैं या एकदम खारिज कर देते हैं। या तो हां या न। खटाखट नतीजों पर पहुंचने की जल्दी में रहते हैं हम। लेकिन खुद के विकास के लिए यह अतिवादी ढर्रा ठीक नहीं है।और भीऔर भी

जीवन के नए-नए अनुभव व सच हमें लंगड़ी टांग पर खड़ा कर देते हैं। हम जहां से, तहां से टेढ़े हो जाते हैं। विचार और कुछ नहीं, इस सारे टेढ़ेपन को दूर कर हमें सीधा व संतुलित बनाने का काम करते हैं।और भीऔर भी

यहां सब लौकिक है, पारलौकिक कुछ नहीं। हम जिन प्रभावों की वजह देख नहीं पाते, दूसरे उसे पारलौकिक बताकर अपना लौकिक हित साधते हैं। वैसे भी पारलौकिक की सत्ता बराबर सिकुड़ती जा रही है।और भीऔर भी

यहां किसी कर्ता की जरूरत नहीं। ऑटो-पायलट मोड में है सब कुछ। आज से नहीं, जब से सृष्टि बनी, तब से। संरचनाएं जटिल होती गईं। नए भाव बनते गए। लेकिन चलता रहा ऑटो-पायलट मोड।और भीऔर भी

बड़ी-बड़ी मंजिलों के चक्कर में क्यों पड़ते हैं? अरे! छोटी-छोटी मंजिल बनाएं और वहां तक चलने का मजा लें। बहुत सारे झंझटों और तनावों से मुक्त रहेंगे। साथ ही नई-नई मंजिलें भी फोकट में मिलती रहेंगी।और भीऔर भी