भाषण लफ्फाजी में कब बदल जाते हैं, इसका पता बोलनेवालों को नहीं चलता, लेकिन सुननेवाले ताड़ लेते हैं। नेताओं को मालूम हो कि क्रिया से दूर ज्ञान और करनी से दूर कथनी ज्यादा नहीं चलती।और भीऔर भी

अमूमन कुछ लोग लिखते हैं, बहुत से लोग पढ़ते हैं। लेकिन इधर लिखनेवाले बहुत हो गए हैं और पढ़नेवाले कम तो इसका मतलब यही है कि रीतापन इतना ज्यादा है कि अब पढ़नेवाले ही कलम उठाने लगे हैं।और भीऔर भी

अपने घर-परिवार और अपनी नजर में तो हर कोई मूल्यवान होता है। लेकिन असली बात यह है कि समाज की नजर में आपका मूल्य क्या है क्योंकि उसी से आपकी सुख-समृद्धि और चैन का फैसला होता है।और भीऔर भी

नई धारणाएं पुराने शब्दों में नहीं बांधी जा सकतीं। वे जीवन में जिस रूप, जिस भाषा में आएं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करना होगा। नया हमारे हिसाब से नहीं ढलेगा। हमें ही उसके हिसाब से ढलना होगा।और भीऔर भी

इस दुनिया में परिवार, प्यार व चंद दोस्तों के अलावा हर कोई पहले अपना फायदा देखता है। इक्का-दुक्का अपवाद संभव हैं। लेकिन फाइनेंस की दुनिया में यह अपवाद नहीं, नियम है। इसलिए पूरा संभलकर।और भीऔर भी

विचार अगर अस्पष्ट हैं, सोच अगर ठंडी है तो इसकी एकमात्र वजह यह है कि हमारी पक्षधरता साफ नहीं है। पहले तय करें कि आप किस खेमे में हैं। फिर देखिए कि आपके विचार कितने प्रखर हो जाते हैं।और भीऔर भी

बढ़ने के दो ही तरीके हैं क्षैतिज या लंबवत। दूब जमीन को पकड़ क्षैतिज रूप से फैलती जाती है। वहीं पेड़ बढ़ने के लिए जमीन में लंबवत धंसता चला जाता है। दूब अपने लिए जीती है। पेड़ सबके काम आते हैं।और भीऔर भी

जो लोग सुधारों की हर गुंजाइश को परखते हुए बढ़ते हैं, वे एक दिन व्यापक क्रांति के संवाहक बन सकते हैं। लेकिन जो लोग सीधे क्रांति को लपकना चाहते हैं, वे अंततः जनता से कटकर अवसरवादी बन जाते हैं।और भीऔर भी

हर किसी को दूसरे की नहीं, दूसरों की पड़ी है। दूसरे के लिए काम करने से क्या मिलेगा? पर दूसरों को लुभा लिया तो धंधा जम जाएगा। दूसरों को साधने में दूसरे के गायब हो जाने का यह रहस्य वाकई गजब है।और भीऔर भी

भारत अगर ऋषियों-मुनियों का देश रहा है तो एकबारगी यह उनसे रीता नहीं हो सकता। दिक्कत यह है कि हम भागकर अतीत की वादियों में यूं गुम हो जाते हैं कि वर्तमान को ठीक से देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी