जब औरों की आशाएं आपसे जुड़ जाती हैं तो जीत या हार सिर्फ आपकी नहीं होती। वह अपने-पराए उन तमाम सामान्य जनों की होती है जो खुद लड़ नहीं सकते लेकिन आपके साथ मर जरूर सकते हैं।और भीऔर भी

जब तक सब कुछ हासिल है, हम खुद को भगवान का राजकुमार माने बैठे रहते हैं। भूल जाते हैं कि यहां कुछ भी अपने-आप नहीं मिलता। हमें जो भी मिला है, वह हमारे अग्रजों-पूर्वजों के कर्मों का फल है।और भीऔर भी

आदतों के बिना ज़िंदगी नहीं चलती। एकदम रसहीन बन जाती है। इसलिए आदतें तो डालनी ही पड़ती हैं। अब यह आप पर है कि आप खुद को अच्छी आदतों का गुलाम बनाते हैं या बुरी आदतों का।और भीऔर भी

हम काम हर कोई नहीं कर सकता। इसलिए हमें काम वही करना चाहिए जो हम सबसे अच्छा कर सकते हैं। बाकी औरों के लिए छोड़ दें। लेकिन आज ये छूट कहां! आज तो हम पैसे के लिए ही काम करते हैं।और भीऔर भी

भाषा हमें अपनी संवेदनाओं को सही तरीके से सजाने-संजोने की क्षमता देती है। भाषा न होती तो कोणार्क के सूर्य मंदिर की परिकल्पना नहीं हो सकती थी और न ही मोनालिसा का अवतरण हुआ होता।और भीऔर भी

कोई इंसान सुखी हो, इसका मतलब कतई यह नहीं कि वह खुश भी हो। खुशी तो एक अनुभूति है जिसका पारा ऊपर-नीचे होता रहता है। खुश रहना एक कला है, जिसकी आदत बड़े जतन से डालनी पड़ती है।और भीऔर भी

बुरे का बोलबाला तभी तक है जब तक अच्छे लोग उदासीन या चुप बैठे रहते हैं। दुनिया में नया ज्ञान, माल व मूल्य तो अच्छे लोग ही लाते हैं। बुरे लोग तो बस उसे इधर-उधर कर लूटते-लपेटते रहते हैं।और भीऔर भी

आशा और विश्वास के बिना किसी मंजिल पर नहीं पहुंचा सकता। आशा और विश्वास पूरी यात्रा के दौरान न केवल संतुलन बनाए रखते हैं, बल्कि वे प्रेरणा देते हैं, शक्ति देते हैं और देते हैं – सहनशीलता।और भीऔर भी

जबरदस्ती के रिश्ते गुलामी व एकाधिकार में ही चलते हैं। स्वेच्छा के रिश्ते तभी चलते हैं जब दोनों का फायदा हो। ग्राहक का भी और कंपनी का भी। सिर्फ ग्राहक का फायदा हो तो कंपनी ही बंद हो जाएगी।और भीऔर भी

हम लाख जतन कर लें, भरपूर तैयारी कर लें, फिर भी अनिश्चितता व अनहोनी की गुंजाइश बनी रहती है। यह कमजोरी नहीं, हमारी सीमा है। इसलिए अनहोनी से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।और भीऔर भी