आदर्श हालात या आदर्श अवसर जैसी कोई चीज व्यवहार में नहीं होती। जो इसकी बाट जोहते हैं, वे मंजिल तक पहुंचना तो दूर, चल ही नहीं पाते। इसलिए थोड़ा कम की आदत डाल लेना ही सही है।और भीऔर भी

हर विचारधारा की उम्र होती है। किसी की कम तो किसी की थोड़ी ज्यादा। इसके बाद स्वार्थों के पैमाने में कसकर वे अपना सारतत्व खो देती हैं। इसीलिए पुरानी को तोड़ नई विचारधाराएं आती रहती हैं।और भीऔर भी

छुटपन में मां, फिर बाप और फिर शरीर ही हमारा खेवैया होता है। इसे शराब के क्षार, धूम्रपान व तंबाकू की घुटन और भोजन की अशुद्धता से अस्थिर रखेंगे तो वह सहजता से कैसे हमारा ख्याल रख पाएगा!और भीऔर भी

जब हम किसी के काम की तारीफ करते हैं तो परोक्ष रूप से उसे जिम्मेदार बनाते हैं। उसे लगता है कि एक गलत कदम भी दूसरों का भरोसा तोड़ सकता है। इसलिए वह बराबर सतर्क व सावधान रहता है।और भीऔर भी

पत्थर से लेकर नेता व अभिनेता तक में प्राण-प्रतिष्ठा हम्हीं करते हैं। फिर उन्हें भगवान बनाकर खुद पिद्दी बन जाते हैं। अरे! अपनी आस्था को बाहर नहीं, अंदर फेकिए। तब देखिए उसका असर और असली प्रताप।और भीऔर भी

जब तक माया है, तभी तक भगवान है। माया के हटते ही भगवान भी उड़न-छू। तब हमें उस विराट सत्ता की अनुभूति होती है जो अंदर-बाहर हिलोर मार रही है और दुनिया का विराट छल भी तब बेपरदा हो जाता है।  और भीऔर भी

मौत से क्या डरना! वह तो किसी पल आएगी और हाथ पकड़कर साथ ले जाएगी। डरना तो जिंदगी से चाहिए जिसे पल-पल जीना पड़ता है, संभालना पड़ता है। जहां जरा-सी चूक पूरी जिंदगी को नरक बना सकती है।और भीऔर भी

केवल विज्ञान ही निरेपक्ष और व्यापक समाज के हित में है। बाकी महान से महान विचार भी निरपेक्ष नहीं होते। उसमें किसी का हित तो किसी का अहित होता है। यह दिखता नहीं, पर देखना जरूरी है।और भीऔर भी

हम प्रकृति से बने हैं। प्रकृति के सामने अक्सर बेबस हो जाते हैं। लेकिन समाज के सामने बेबसी बकवास है। समाज को हमने बनाया है तो इसे ठोंक-पीटकर बराबर दुरुस्त करते रहने का काम भी हमारा है।और भीऔर भी

सब कुछ गोल है तो देख पाने की सीमा है। पर फायदा यह है कि आगे क्या होनेवाला है, इसका आभास पहले ही हो जाता है। सूरज की लालिमा बाद में आती है। रात की कालिमा उससे पहले ही छंटने लगती है।और भीऔर भी