साहस और प्रतिभा
प्रतिभा को साहस और बहादुरी का साथ न मिले तो वह कभी खिल ही नहीं सकती। डर-डर कर जीनेवाला दुनियादार हो सकता है, प्रतिभाशाली नहीं। प्रतिभा तो हमेशा लीक से हटकर, खांचे को तोड़कर चलती है।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
प्रतिभा को साहस और बहादुरी का साथ न मिले तो वह कभी खिल ही नहीं सकती। डर-डर कर जीनेवाला दुनियादार हो सकता है, प्रतिभाशाली नहीं। प्रतिभा तो हमेशा लीक से हटकर, खांचे को तोड़कर चलती है।और भीऔर भी
लोगों को खुश करने के फेर में आप वो नहीं कर पाते जो आप में और आप जिसमें रचे-बसे हो। इसलिए वही करें जिसमें आपको आनंद आता है। दिल की बात सुननेवालों से कामयाबी भी ज्यादा दूर नहीं रह पाती।और भीऔर भी
भविष्य की लकीरें दिखतीं नहीं तो लोग हाथों की लकीरों के चक्कर में फंस जाते हैं। लेकिन लकीरों का चक्कर खुद की क्षमता और कर्म की ताकत पर भरोसा घटा देता है और वे लड़ने से पहले ही हार जाते हैं।और भीऔर भी
जब तक हम किसी चीज में डूबे हैं, तभी तक उससे आक्रांत हैं। बाहर निकलते ही लगता है कि इस कदर परेशान होना गलत था। लेकिन सृजन के लिए डूबना ही पड़ता है तो समझ के लिए निकलना भी पड़ता है।और भीऔर भी
इस समूची सृष्टि में हर सीधी रेखा किसी न किसी बड़े वक्र का हिस्सा होती है। अगर लगता है कि कोई चीज सीधी रेखा में चल रही है तो वो अल्पकालिक सच है। दीर्घकाल में हर चीज चक्र में ही चलती है।और भीऔर भी
जो भगवान का जितना बड़ा भक्त है, वो सच्चे दोस्तों से उतना ही महरूम होता है। बेचारा अंदर से निपट अकेला होता है। उसका अकेलापन दूर कीजिए। दोस्त बनिए। भगवान का भ्रम मिटता चला जाएगा।और भीऔर भी
जब तक आप इंद्रियों के जाल में फंसे हो, पुरुष स्त्री और स्त्री पुरुष को देखकर खिंचती है, खाने को देखकर लार टपकती है, तब तक आप बन रहे होते हैं, बड़े नहीं होते। वयस्क होने के बावजूद छोटे रहते हो।और भीऔर भी
ज्ञान तो विशाल सागर नहीं, अक्षय पात्र है। पुराना निकालो, नया बनता जाता है। कभी शेष नहीं होता। जब तक जीवन है, तब तक मन खदबद करता रहता है और ज्ञान का नया सत्व निकलता रहता है।और भीऔर भी
जीवन में एक ही चीज निश्चित है। वो है मौत। बाकी सब कुछ अनिश्चित है। ऐसे में भविष्य से घबराने की क्या जरूरत! क्योंकि इन अनिश्चितताओं को नाथकर अपना भविष्य तो हम खुद ही बना सकते हैं।और भीऔर भी
हम सभी के अंदर एक चुम्बक है जो माफिक चीजों को खींचकर लगातार एक पैटर्न बनाता रहता है। इसी पैटर्न से हमारा व्यक्तित्व बनता है, जबकि इसका एक अंश शब्दों का आकार पाकर विचार बन जाता है।और भीऔर भी
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