व्यक्ति और समाज
व्यक्ति पर प्रभाव बाहर के होते हैं, असर अंदर से होता है। लेकिन व्यक्तियों से बने समाज में खामी संरचनागत होती है। इसलिए व्यक्ति व समाज की समस्याओं का निदान कभी एक जैसा नहीं होता।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
व्यक्ति पर प्रभाव बाहर के होते हैं, असर अंदर से होता है। लेकिन व्यक्तियों से बने समाज में खामी संरचनागत होती है। इसलिए व्यक्ति व समाज की समस्याओं का निदान कभी एक जैसा नहीं होता।और भीऔर भी
हम अपने में इस कदर डूबे रहते हैं कि बाढ़ का पानी किस कदर करीब आ पहुंचा है, पता ही नहीं चलता। जब हम ठीक डूबने की कगार पर होते हैं, तब जागते हैं। लेकिन तब तक तो काफी देर हो चुकी होती है।और भीऔर भी
इस दुनिया-जहान में कुछ भी अनायास नहीं होता। हर चीज में एक पैटर्न है। हर घटना के पीछे कोई न कोई नियम है। जिसे देख नहीं पाते, उसे हम अपवाद कह देते हैं। लेकिन अपवाद भी नियमों के अधीन है।और भीऔर भी
जिसके पास पैसा है, उसके पास पूंजी हो, जरूरी नहीं। जिसके पास पूंजी है, वह अमीर हो, जरूरी नहीं। पैसा उद्यम में लगता है तो पूंजी बनता है। दृष्टि सुसंगत बन जाए, तभी पूंजी किसी को अमीर बनाती है।और भीऔर भी
आज का जमाना ही सपने देखने-दिखाने और उन्हें पूरा करने का जमाना है। अगर आप अपने सपने के लिए काम नहीं करते तो दूसरों के सपनों के लिए काम करते हैं। अपने या दूसरों के लिए? फैसला आपका है।और भीऔर भी
हर कोई चाहता है कि वह पीछे ऐसा कुछ छोड़कर जाए कि दुनिया उसे याद करें। लेकिन गिने-चुने लोग ही ऐसा कर पाते हैं क्योंकि एक तो सभी में वैसी प्रतिभा नहीं होती, दूसरे हर कोई वैसा जोखिम नहीं उठाता।और भीऔर भी
संपूर्ण कमोबेश स्थिर है। पर अंश बराबर रीसाइकल होता रहता है। बनने-मिटने-बनने का चक्र अनवरत चलता है। ये नीरस-सा चक्र ही जीवन है। यह चक्र रुक जाए तो हर तरफ हाहाकार मच जाएगा।और भीऔर भी
भगवान को क्या खोजते हैं! खोजना ही है तो खुद को खोजिए जो इस भवसागर में कहीं खो गया है। अपनी खोज करेंगे तो खुद को पाने पर तर जाएंगे। भगवान को खोजेंगे तो दूसरों के धंधे का शिकार बन जाएंगे।और भीऔर भी
दुनिया को जीने के लिए बेहतर जगह बनाने के संघर्ष में लगे लोग निश्चित रूप से धन्य हैं। लेकिन जो घर को जीने की बेहतर जगह बनाने में लगे है, उनकी इत्ती उपेक्षा क्यों? आखिर आधी दुनिया तो वही हैं!और भीऔर भी
हर दिन देश-दुनिया व समाज में इतना कुछ घटित होता है कि उन्हें जानकर हम एक ही दिन में परम ज्ञानी बन सकते हैं। लेकिन नजर की सीमा और आत्मग्रस्तता के कारण हम बहुत कुछ देख ही नहीं पाते।और भीऔर भी
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