कितना अजीब है कि जो भावनाओं से हीन हैं, वे हम सबकी भावनाओं से खेलते हैं। नेता से अभिनेता और कॉपीराइटर तक। पर जो भावनाओं से भरे हैं, उनमें शहादत का भाव तो लबालब है, सीखने का सब्र नहीं।और भीऔर भी

अनुभूति पहले आती है। शब्द बाद में आते है। शब्दों के खो जाने के बाद भी अनुभूति बची रहती है क्योंकि वही मूल है, शब्द तो छाया हैं। दोनों में द्वंद्व है समाज और व्यक्ति का, इतिहास और वर्तमान का।और भीऔर भी

चीजें वही, लोग भी वही रहते हैं। लेकिन जान-पहचान होते ही उनका पूरा स्वरूप बदल जाता है। पूर्वाग्रह छंट जाते हैं। असली छवि सामने आ जाती है। इसलिए दूर के नहीं, पास के रिश्ते बनाने जरूरी हैं।और भीऔर भी

जीतने के भाव के साथ ही जीने का आनंद है। बाकी नहीं तो हारे को हरिनाम है। यह भाव आप किसी संस्था का हिस्सा बनकर हासिल कर लेते हैं या अपने दम पर लड़ते हुए नई प्रासंगिक संस्थाएं बनाकर।और भीऔर भी

इस दुनिया में आए हैं तो बिना रुके बराबर चलना ही पड़ेगा क्योंकि यहां कुछ भी ठहरा नहीं, सब कुछ चल रहा है। सही राह चुन ली, तब भी चलते रहना जरूरी है क्योंकि बीच में ठहर गए तो कुचल दिए जाएंगे।और भीऔर भी

महज रस्से के सहारे तीखे पहाड़ को पार करने की हिम्मत बिरले लोग ही जुटा पाते हैं। उनके जैसा बनने का मंसूबा तो हम नहीं पाल सकते। लेकिन उनके जैसा आत्मविश्वास हम जरूर पाल सकते हैं।और भीऔर भी

सत्ता के सच को कभी सच मानने की गलती नहीं करनी चाहिए। वो अपने काम का ही सच पेश करती है। जब श्रीकृष्ण तक शंख के शोर में अधूरे सच को पूरा सच बना देते हैं तो औरों का क्या भरोसा?और भीऔर भी

अजब तमाशा है ये ज्ञान की दुनिया। बाहर जाओ तो अंदर पहुंचते हो और अंदर पैठो तो बाहर का धुंधलका छंटने लगता है। शायद वही-वही संरचनाएं अंदर से बाहर तक थोड़े-बहुत अंतर के साथ फैली पड़ी हैं।और भीऔर भी

ख्वाब देखें बड़ा। लेकिन बोलें छोटा। होता यह है कि ज्यादातर लोग सपने तो छोटे देखते हैं, पर बोलते हैं बढ़ा-चढ़ाकर। झूठे गुरूर में डूबे ऐसे लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे कब जगहंसाई के पात्र बन गए।और भीऔर भी

आप खुद को कितना भी बडा़ तोप-तमंचा समझते रहें, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क इस बात से पड़ता है कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं और यह सोच खुद नहीं बनती, सायास बनानी पड़ती है।और भीऔर भी