देश यकीनन वहां रहनेवालों से बनता है। लेकिन उसे रहने लायक बनाती हैं स्थानीय से लेकर राज्य व राष्ट्रीय सरकारें। अगर हर तरफ गंदगी, कदाचार व भ्रष्टाचार है तो पूरा सरकारी तंत्र ही देशद्रोही है।और भीऔर भी

कर्ता बाहर का नहीं, अंदर का ही कोई जीव-अजीव है। संतुलन हासिल करने के क्रम में सचेत-अचेत कर्म ही हर घटना के कारक हैं। बाकी सब समझने की सुविधा के लिए हम जैसे इंसानों द्वारा गढ़े गए पुतले हैं।और भीऔर भी

जीवन संविधान से मिला मूल अधिकार है। पर जब हमारे होने, न होने से किसी को कोई फर्क न पड़े तो हम जीते हुए भी मर जाते हैं। अगर आज करोड़ों लोग अप्रासंगिक हैं तो यह तंत्र ही संविधान-विरोधी है।और भीऔर भी

इस जहां में सिर्फ एक चीज है जिस पर इंसान का वश नहीं है। वो है समय और उसी से संचालित होता जीवन-मरण का चक्र। बाकी किसी भी चीज की काट नियमों को समझकर निकाली जा सकती है।और भीऔर भी

हम किस आशय/भाव से कोई बात कहते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। महत्व इसका है कि उससे संदेश क्या गया, संप्रेषित क्या हुआ। सो, बोलने से पहले सामनेवाले की स्थिति पर गौर कर लेना चाहिए।और भीऔर भी

कहीं एक तारा टूटकर डूब गया। देखा आपने? कहीं एक कोंपल पेड़ की अकाल मौत से कुम्हला कर सूख गई। देखा आपने? आपके अंदर का इंसान निर्वासित हो गया। अजीब हैं! कुछ भी क्यों नहीं देखते आप?और भीऔर भी

लोग आपको बारंबार कौआ साबित करने की कोशिश करेंगे। लेकिन आप हंस हो तो उसकी उज्ज्वल ठसक के साथ रहो। किसी का कहा दिल पर लोगे तो जमाने की ठगी का शिकार बन जाओगे और पछताओगे।और भीऔर भी

लोकतंत्र में फैसले लेना बड़ा आसान है क्योंकि बहुमत की राय आसानी से जानी जा सकती है। फैसलों में मुश्किल तब आती है कि कोई सरकार बहुमत के नाम पर अल्पमत का हित सब पर थोपना चाहती है।और भीऔर भी

विचार उस टॉर्च की तरह हैं जो हर अंधेरे मोड़ पर आपको दस गज दूर तक का ही रास्ता दिखाते हैं। इसलिए सफर में निरंतर आगे बढ़ने के लिए हर मोड़ पर विचारों को नई दिशा, नई रौशनी देनी जरूरी है।और भीऔर भी

सरहद और सरकारों के तंत्र से राष्ट्र नहीं बना करते। बहुमत का हुंकार भी राष्ट्र नहीं बनाता। इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता। राष्ट्र बनता है दिल से, भरोसे से और साझा समस्याओं की साझा समझ से।और भीऔर भी