ज़िंदगी हमारी अपनी है। पर धरती हम साझा करते हैं। हवा-धूप साझा करते हैं। दुनिया साझा करते हैं। देश साझा करते हैं। प्रशासन व राजनीतिक तंत्र साझा करते हैं। जो साझा है, उसकी भी तो फिक्र जरूरी है।  और भीऔर भी

पीपल की पत्तियां जरा-सी हवा पर उछलने-कूदने लगती हैं। वहीं बरगद और उसकी पत्तियां बड़े से बड़ा तूफान भी शांति से झेल जाती हैं। लेकिन जीवन में दोनों की अपनी जगह है, अपनी अहमियत है।और भीऔर भी

हम अगर ताज़िंदगी एक ही जगह कदमताल करते रह जाते हैं तो इसके लिए हालात कम, हम ज्यादा दोषी हैं क्योंकि हालात किसी भगवान से नहीं, हमारे जैसे इंसानों से ही बनाए हैं जिनसे हम लोहा ले सकते हैं।और भीऔर भी

समय के साथ होड़ लेने का दावा करना शुद्ध दंभ के सिवा कुछ नहीं। समय के साथ हम संगत बैठा लें, यही काफी है। यह भी हर किसी के बूते में नहीं। बिरले ही इसे हासिल कर पाते हैं, भारी साधना के बाद।और भीऔर भी

एक व्यक्ति विशाल संस्था से कैसे लड़ सकता है? अकेला चना भाड़ कैसे फोड़ सकता है? लेकिन अंधेरे को चीरने के लिए एक दीया ही काफी है। रावण की लंका जलाने के लिए एक हनुमान ही काफी होता है।और भीऔर भी

सफर पर निकला मुसाफिर हूं। न संत हूं, न परम ज्ञानी। मेरे पास ज्ञान का खजाना नहीं जो आपको बांटता फिरूं। हर दिन बोता हूं, काटता हूं। दिहाड़ी का चक्र। जो मिलता है, उसे आप से साझा कर लेता हूं।और भीऔर भी

जब मूल वस्तु ही स्थिर नहीं तो उसकी छाया कैसे स्थिर हो सकती है? दुनिया में सब कुछ हर पल बदल रहा है तो हमारे विचार कैसे स्थिर रह सकते हैं? पीछे छूट गए बच्चे की तरह उन्हें साथ ले आना जरूरी है।और भीऔर भी

मैं नहीं, तू सही। तू नहीं, कोई और सही। सांसारिक सुख तो मैं किसी भी नाम में, किसी भी शरीर में घुस कर हासिल कर सकता हूं। लेकिन अंदर का सुख मेरा अपना है जिसे मैं चाह कर भी बांट नहीं सकता।और भीऔर भी

ज्ञान ऐसा मनोरंजन है जो हमारे अंदर उन अनुभूतियों के रंध्र खोल देता है जो पहले हमारी पहुंच में थीं ही नही। आम मनोरंजन हमें निचोड़ डालता है, जबकि ज्ञान हमारी संवेदनाओं को उन्नत बनाता है।और भीऔर भी

बड़ा आसान है निष्कर्षों में सच को फिट करके संतुष्ट हो जाना। लेकिन सच से निष्कर्षों को निकालना उतना ही मुश्किल है क्योंकि अपने करीब पहुंचते ही सच खटाक से नई-नई परतें खोलने लग जाता है।और भीऔर भी