विश्लेषण के लिए अंश को अलग देखना सही है। लेकिन हर अंश संपूर्ण के साथ इस कदर गुथा हुआ है कि उसे छोड़ देने पर अर्थ का अनर्थ हो जाता है। पेट में गया भोजन ऊर्जा बनता है, जबकि थाली में रखा व्यंजन कुछ घंटों बाद सड़ने लगता है।और भीऔर भी

ज़िंदगी तो इतनी जाहिल और जिद्दी है कि बजबजाते नाले में भी पनप जाती है। लेकिन उसके दम पर खिले किसी भी अंबानी, बच्चन या पवार की मूल खुराक गंदगी है। वे ऊपर से कितने भी खूबसूरत दिखें, मगर अंदर भयंकर सडांध भरे रहते हैं।और भीऔर भी

जगने का वक्त हो जाने के बावजूद जो लोग सोते रहते हैं, उनकी आत्मा अंदर ही अंदर फड़फड़ाती रहती है। उसी तरह जैसे पिजड़े में कोई पंछी फड़फड़ाता है। ऐसे में जब वे कायदे से सो भी नहीं पाते तो आलस को झटक कर उठ जाना ही बेहतर है।और भीऔर भी

सृजनात्मक विनाश और विनाशकारी सृजन का सिलसिला अटूट है। जंगल की आग के बाद पहले से ज्यादा बलवान नए अंकुर फूटते हैं। नई तकनीक पुरानी को ले बीतती है। शिव सृष्टि और समाज के इसी सतत विनाश और सृजन के प्रतीक हैं।और भीऔर भी

हमें हर वक्त अपना काम इतना टंच रखना चाहिए और जीवन को इतने मुक्त भाव से जीना चाहिए कि अगले ही पल अगर मौत हो जाए तो कतई मलाल न रहे कि हमने ये नहीं किया या वो नहीं किया। जिम्मेदारी से जीना। मुक्त मन से जाना।और भीऔर भी

चप्पे-चप्पे पर कोई न कोई काबिज़ है। हर विचार किसी ब्रह्म ने नहीं, इंसान ने ही फेंके हैं और उनके पीछे किसी न किसी का स्वार्थ है। हम भी स्वार्थ से परे नहीं। ऐसे में विचारों को अगर निरपेक्ष सत्य मानते रहे तो कोई दूसरा हमें निगल जाएगा।और भीऔर भी

तन से मुक्ति तो एक निश्चित विधान के हिसाब से अंततः हर किसी को मिल ही जाती है। लेकिन मरने से पहले तन से मुक्ति मन की मुक्ति के बिना नहीं मिलती। और, मन की मुक्ति के लिए सच्चा ज्ञान जरूरी है जो बड़ी मेहनत से मिलता है।और भीऔर भी

खुद को जीतना सबसे बड़ी जीत है। यहीं से हर विजय-पथ की चाभी मिलती है। अगर अपने को नहीं जीत सके, संयम नहीं रख सके तो कुछ भी हासिल करना असंभव है क्योंकि बिखरी-बिखरी शक्तियां आपकी मारक क्षमता को ही मार देती हैं।और भीऔर भी

अपने-आप में तो हर कोई पूर्ण है। जानवर भी पूर्ण, इंसान भी पूर्ण। ओस की बूंद तक एकदम गोल। प्रकृति ने संतुलन का नियम ही ऐसा चला रखा है। पर बाहर से देखो तो सब कुछ अपूर्ण। गुमान तोड़कर देखने पर ही यह अपूर्णता नज़र आती है।और भीऔर भी

समय कभी पीछे नहीं चलता। हर नई चीज पहले जैसी दिखती हुई भी उससे भिन्न होती है। नए की मांग अलग, नई समस्या का समाधान अलग। इसलिए पीछे मुड़कर न देखें क्योंकि यहां न तो पुराने कपड़ों और न ही पुराने विचारों से काम चलेगा।  और भीऔर भी