आदत से अशक्त
जो साफ-साफ दिखता है, उसको उल्टा देखना हमारी आदत है। हम जिस पर अंध आस्था रखते हैं, जिससे शक्ति पाने की उम्मीद करते हैं, उससे हमें कुछ नहीं मिलता। बल्कि हमारी शक्ति उसे मिल जाती है। वह शक्तिमान बन जाता है और हम दीनहीन।और भीऔर भी
सूरज निकलने के साथ नए विचार का एक कंकड़ ताकि हम वैचारिक जड़ता तोड़कर हर दिन नया कुछ सोच सकें और खुद जीवन में सफलता के नए सूत्र निकाल सकें…
जो साफ-साफ दिखता है, उसको उल्टा देखना हमारी आदत है। हम जिस पर अंध आस्था रखते हैं, जिससे शक्ति पाने की उम्मीद करते हैं, उससे हमें कुछ नहीं मिलता। बल्कि हमारी शक्ति उसे मिल जाती है। वह शक्तिमान बन जाता है और हम दीनहीन।और भीऔर भी
पहले दुनिया सिमटी हुई थी। इर्दगिर्द खास कुछ नहीं बदलता था तो लोग सुबह-सुबह नहा-धोकर एकाध घंटे पूजापाठ करते थे। अपने अंदर झांकते थे। अब दुनिया बढ़ते-बढ़ते ग्लोबल हो गई है तो एकाध घंटे अखबारों के जरिए बाहर झांकना जरूरी हो गया है।और भीऔर भी
किसी के बिना किसी का भी काम नहीं रुकता। सबकी अपेक्षाकृत स्वतंत्र ज़िंदगी है, हिचकोले खा पटरी पर आ जाती है। ऐसे में किसी को जोड़ने का सही तरीका उसे जबरन खीचना नहीं, बल्कि वो जहां है, वहीं उसकी ज़िंदगी को और चमकाने का सूत्र दे देना है।और भीऔर भी
जीनव की कठिन शर्तें। मैराथन। जीने और जीतने की अदम्य चाहत। इसे हासिल करने में जो मददगार हो सकता है, लोग तो उसे ही देखेंगे, उसे ही पूछेंगे। हालांकि, हम सब एक-दूजे के लिए उपयोगी हैं। लेकिन इसे दिखाना और साबित भी करना पड़ता है।और भीऔर भी
एक तो मानव मस्तिस्क की संरचना, ऊपर से वर्तमान के खांचे में कसी सोच की धृतराष्ट्री जकड़। सो, वर्तमान की सार्थक आलोचना और भविष्य की तार्किक दृष्टि तक हम पहुंच ही नहीं पाते और आगे बढ़ने की कोशिश में हमेशा मुंह की खाते रहते हैं।और भीऔर भी
हम वर्तमान की जमीन पर खड़े होकर, उसी के फ्रेम में रहकर भविष्य का अनुमान लगाते हैं। भविष्य में यह फ्रेम खुद कैसे बदल जाएगा, इसका पता नहीं रहता। इसीलिए बड़े-बड़े विशेषज्ञों तक की भविष्यवाणियां बाद में हास्यास्पद साबित हो जाती हैं।और भीऔर भी
हालात जितने मुश्किल हों, हमारी मुस्कान उतनी ही बढ़ जानी चाहिए। अन्यथा हम मुश्किलों से सीख नहीं पाएंगे। हम दुखी नहीं, खुश रहने पर ही सीख पाते हैं। और, खुश रहना एक मानसिक अवस्था है जिसकी कुंजी हमेशा हमारे हाथ में रहती है।और भीऔर भी
ज़िंदगी का असली मूल्य महज गणनाओं में नहीं, बल्कि यह जानने व पता लगाने में है कि असली चीजें क्या हैं और कैसे काम करती हैं। दुनिया हमें धकेलती है हिसाब-किताब लगाने की तरफ। लेकिन असली चीजें हिसाब-किताब से बहुत परे होती हैं, बंधु!और भीऔर भी
जो लोग थोड़े समय में अपना निवेश वापस पा लेना चाहते हैं, वे अदूरदर्शिता के शिकार हैं। थोड़े समय में कोई भी विचार पूरा खिल नहीं पाता। हो सकता है कि कई साल तक उससे कुछ न निकले। लेकिन जब वह फलीभूत होगा तो अरबों की बारिश कर सकता है।और भीऔर भी
सही व काम की शिक्षा पर किया गया खर्च कभी बेकार नहीं जाता। वो तो निवेश की तरह है जिसमें अभी उठाई गई थोड़ी-सी तकलीफ बाद में बड़े आराम का आधार बन जाती है। इसलिए शिक्षा को कभी उपभोग नहीं, हमेशा निवेश मानना चाहिए।और भीऔर भी
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