शेयर बाज़ार में नियमन के नाम पर किसी भी विचार को दबाना बाज़ार के विकास को कुंठित करना है। ऐसा करने पर बाजार मूल्य-खोज की भूमिका ही नहीं निभा सकता। यहां तो हज़ारों विचारों को खुलकर टकराने देना चाहिए। नहीं तो बाज़ार का आधार व्यापक नहीं, बल्कि मुठ्ठी भर ऑपरेटरों के हाथ में सिमटकर रह जाएगा। आज भारतीय शेयर बाज़ार की हालत कमोबेश ऐसी ही है। अब इसके ऊपर सेबी डिजिटल प्लेटफॉर्म को मान्यता देने के नामऔरऔर भी

पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी ने करीब डेढ़ महीने पहले 22 अक्टूबर को शेयर बाज़ार पर लिखने या बोलने वाले तमाम डिजिटल प्लेटफॉर्म को कंट्रोल करने के लिए जो मशविरा पत्र जारी किया है, उस पर वो अंततः सर्कुलर जारी करके अपना अंकुश कस देगी। पब्लिक से सलाह लेने की बात तो महज खानापूरी होती है। यह कंट्रोल उन लोगों के लिए है जो अभी तक सेबी के नियामक दायरे से बाहर हैं। बाकी जो भी पूंजीऔरऔर भी

देश की पूंजी बाज़ार नियामक संस्था, सेबी की ज़िम्मेदारी है कि वो करोड़ों मासूम निवेशकों की हिफाजत करे। सुनिश्चित करे कि बाज़ार में पहले से लिस्टेड और आईपीओ लाने वाली नई कंपनियां सारी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराएं। लेकिन यहां तो स्थिति यह है कि खुद सेबी की चेयरपरसन माधबी पुरी बुच ने अडाणी की ऑफशोर कंपनियों में अपने निवेश की बात छिपाई है। उन पर पूंजी बाज़ार के नियमों की अवहेलना करने और पद कीऔरऔर भी

भाजपा व मोदी सरकार से जुड़े दो वरिष्ठ वकीलों – मुकुल रोहतगी और महेश जेठमलानी ने सवाल उठाया है कि अमेरिका को क्या पड़ी है कि वो भारत के उद्योगपति गौतम अडाणी पर तोहमत लगा रहा है। लेकिन उन्होंने नहीं बताया कि अमेरिका के न्याय विभाग और वहां के पूंजी बाज़ार नियामक एसईसी ने गौतम अडाणी और उनके भतीजे सागर अडाणी समेत सात अन्य सहयोगियों के खिलाफ इसलिए सम्मन जारी किया क्योंकि उन्होंने अमेरिका के निवेशकों केऔरऔर भी