रिस्क से निपटने की तैयारी न हो तो सबसे बड़ा नुकसान ज्यादा पूंजी गंवाने के अलावा यह होता है कि हम भावनात्मक रूप से टूट जाते हैं। ध्यान रखें कि ट्रेडिंग में सबसे प्रमुख हथियार है हमारा भावनात्मक संतुलन। अगर वो टूटा तो हम ऐसे गलत कदम उठाते हैं कि उबरने के बजाय घाटे के दलदल में धंसते चले जाते हैं। युद्ध और ट्रेडिंग में अपनी भावनाओं पर काबू रखना निहायत ज़रूरी है। अब मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी

ज़िंदगी और बाज़ार का रिस्क हम बखूबी समझते हैं। हमें समझाने की ज़रूरत नहीं। लेकिन साथ ही हम मानकर चलते हैं कि कम से कम हमारे साथ ऐसा नहीं होने जा रहा। दरअसल, यही सबसे बड़ा रिस्क है क्योंकि जब वो हमें दबोचता है तब हमारी कोई तैयारी होती और हम हालात, किस्मत या किसी दूसरे को दोष देकर रोने लगते हैं। बजाय इसके मानकर चलें कि रिस्क कभी भी घट सकता है। अब सोमवार का व्योम…औरऔर भी

यह कंपनी नोट नहीं छापती, बैंक भी नहीं है। लेकिन कैश इसकी ताकत है। खास कमोडिटी के धंधे से जुड़ी है। लेकिन जिंसों के अंतरराष्ट्रीय भाव 16 साल की तलहटी पर हैं, चीन की आर्थिक सुस्ती से समूची दुनिया त्रस्त है, डंपिंग का मंडराता खतरा है, तब भी इससे कंपनी की सेहत पर कोई फर्क नहीं। फिर, सरकारी कंपनी होने के बावजूद इसने शेयरधारकों की दौलत घटाई नहीं, बढ़ाई है। तथास्तु में आज इसी कंपनी का दमखम…औरऔर भी

जो ठहरा वो मरा। जो चलता रहा, वही ज़िंदा है। सदियों पहले बुद्ध ने जीवन में निरतंर परिवर्तन की कुछ ऐसी ही बात कही थी। जो व्यक्ति या संस्थान समय के हिसाब से बदल नहीं पाता, वो खत्म हो जाता है। लेकिन ‘अर्थकाम’ ने तो न मिटने की कसम खा रखी है तो बनने से लेकर अब तक कई तरह के उतार-चढ़ाव देखें, झंझावात देखे। मगर, हर बार वित्तीय साक्षरता और आर्थिक सबलता के अधूरे मिशन कोऔरऔर भी

अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो आता था, लेकिन निकलना नहीं। इसीलिए कौरव सेना के महारथियों ने उसे घेरकर मार डाला। अपने यहां भी निवेशक बाज़ार के बढ़ने पर ही कमा सकते हैं। निकलने पर कमाने का रास्ता उनके लिए बहुत उलझा और जोखिम भरा है। या तो इंट्रा-डे ट्रेडिंग या फ्यूचर्स व ऑप्शंस। साथ में स्टॉक लेंडिंग व बॉरोइंग का भी कुछ चक्कर है जो अपने-आप में बहुत उलझा हुआ है। अब करें शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी