भारतीय अर्थव्यवस्था में अगले बीस सालों तक ठहराव या मंदी आने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि 125 करोड़ की आबादी में से अभी तक 100 करोड़ का बाज़ार तो खुला ही नहीं है। हमारा जीडीपी इस साल मरी-गिरी हालत में भी 7.4% बढ़ना चाहिए। वो भी तब, जब कृषि की विकास दर शायद 0.1% भी न रहे। सोचिए, कृषि अगर 4% सालाना बढ़ने लगे तो जीडीपी कहां पहुंच जाएगा! आज कृषि से जुड़ी एक जानदार कंपनी…औरऔर भी

हमारा अहम स्वभाव है कि हम दुविधा नहीं, पक्का चाहते हैं। साफ हां-ना में जवाब चाहते हैं और उसके आधार पर फैसला करते हैं। लेकिन फाइनेंस में निश्चित स्वीकार या नकार नहीं होता। शून्य और एक प्रायिकता के दो छोर हैं। वास्तविक प्रायिकता कहीं इसके बीच होती है। दिक्कत यह है कि 20-30% को हम शून्य और 60-70% को 100% बना देते हैं। यह अतिवादी सोच बाज़ार में हमें कहीं का नहीं छोड़ती। अब शुक्रवार का अभ्यास…औरऔर भी

हम अक्सर अतिविश्वास में डूबे होते हैं। सौदा पिटने के बावजूद खुद को सही मानते हुए उससे चिपके रहते हैं। जैसे बंदरिया मरे हुए बच्चे को सीने से चिपकाए रहती है। स्वीकार कीजिए कि हम सही होने का सट्टा-बयाना लिखाकर नहीं आए हैं। बड़े-बड़े दिग्गज गलत हो जाते हैं तो हमारी क्या बिसात! सही तो ठीक। गलत तो पहला स्टॉप-लॉस लगते ही बाहर। चिपकने नहीं, छोड़ने में जीतने की असली सोच छिपी है। अब गुरु की दशा-दिशा…औरऔर भी

हम सभी के साथ समस्या है कि हम पछताते बहुत हैं। बार-बार ऐसा होता है कि कोई शेयर देखकर छोड़ देते हैं। अगले दिन जब वो 5% से ज्यादा उछल जाता है तो पछताते हैं कि काश! वो सौदा पकड़ लिया होता। असल में, यह सामान्य मानव मनोविज्ञान है। लेकिन यह सहजता-भरी सोच ट्रेडिंग के लिए घातक है। हम समय में पीछे नहीं जा सकते। इसलिए हमेशा आगे देखने का अभ्यास करना चाहिए। अब बुधवार की बुद्धि…औरऔर भी

बहुत सारे लोग मानते हैं कि शेयर बाज़ार सटोरियों का अड्डा है और यहां अधिकांश लोग जुआ खेलते हैं। यह मान्यता बहुत हद तक सही भी है। पिछले ही हफ्ते एक सब्सक्राइबर ने लिखा कि ऐसा जैकपॉट बताइए कि किस्मत चमक जाए। कैसे कहूं कि यह सोच एक तरह का डिप्रेशन दिखाती है। सच है कि बाज़ार में भविष्य का कयास लगाया जाता है, लेकिन यह सट्टेबाज़ी की तरह अंधा नहीं होता। अब निकालें मंगलवार की दृष्टि…औरऔर भी