निवेश में हम अक्सर दो अतियों की तरफ भागते हैं। या तो एकदम आसान और पका-पकाया रास्ता तलाशते हैं जिसमें हमें कुछ न करना पड़े। बस किसी ने बता दिया और हमने खरीद लिया। बतानेवाला कोई दोस्त, वॉट्स-अप ग्रुप, ब्रोकर, बिजनेस चैनल का एनालिस्ट, अखबार या वेबपोर्टल का कॉलम तक हो सकता है। नहीं तो हम निवेश के एल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा के चक्कर में ऐसे उलझ जाते हैं कि समय पर कोई फैसला नहीं करऔरऔर भी

शेखचिल्ली के बड़े-बड़े दावे। सारे के सारे खोखले, ज़मीन पर फिसड्डी। चाहे वो राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला हो या अर्थव्यवस्था का। मोदी सरकार की 10-11 साल की कुल जमापूंजी यही है। वो समस्याएं सुलझाती नहीं। नई समस्याएं ज़रूर पैदा कर देती है। पिछले दशक में अर्थव्यवस्था में दोहरी बैलेंसशीट की समस्या थी। एक तरफ कॉरपोरेट क्षेत्र पर ऋण का बोझ ज्यादा ही बढ़ गया था। दूसरी तरफ बैंकों के एनपीए या डूबत ऋण काफी बढ़ गए थे।औरऔर भी

यह कहीं इधर-उधर की नहीं, बल्कि खुद भारतीय रिजर्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट में जताई गई चिंता है। भारतीय परिवारों पर चढ़ा ऋण जून 2021 में जीडीपी का 36.6% हुआ करता था। यह दिसंबर 2023 तक 40.2%, मार्च 2024 तक 41% और जून 2024 तक 42.9% पर पहुंच गया। 2015 से 2019 तक हमारे घरों पर चढ़ा ऋण औसतन जीडीपी का 33% हुआ करता था। इससे भी पहले चले जाएं तो वित्त वर्ष 2011-12 के अंत मेंऔरऔर भी

उधार लेना भारतीय संस्कृति, समाज व परम्परा का हिस्सा कभी नहीं रहा, जबकि पश्चिमी देशों में ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ आम जीवन का हिस्सा बन चुका है। इसका प्रमुख कारण यह हो सकता है कि भारत में भावी आय का कोई भरोसा या गारंटी नहीं है, जबकि पश्चिमी देशों में नौकरी गई, तब भी कई महीनों तक ठीकठाक बेरोज़गारी भत्ता मिलता रहता है। लेकिन विडम्बना यह है कि भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े घोषित रक्षक दलऔरऔर भी

देश के मध्यवर्ग के लिए स्वास्थ्य बीमा लेना एक ज़रूरी खर्च है। लेकिन वह इतने दवाब में है कि इस खर्च से भी हाथ खींच रहा है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक मार्च में खत्म हुए वित्त वर्ष 2024-25 में बीमा कंपनियों को मिला कुल स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम केवल 8.98% बढ़ा है, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2023-24 में यह 20.25% बढ़ा था। आर्थिक दबाव से उच्च मध्यवर्ग भी नहीं बचा है। पिछले साल अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और यूरोपीयऔरऔर भी