मोदी सरकार अब भी शेखी बघारने से बाज नहीं आ रही, जबकि उसके विदेशी निवेश आधारित विकास मॉडल के पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी है। रिजर्व बैंक के मुताबिक भारत वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान नए प्रोजेक्ट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को लेकर अमेरिका, ब्रिटेन व फ्रांस के बाद चौथा पसंदीदा देश रहा है। वित्त मंत्रालय इसका ढोल जमकर बजा रहा है। लेकिन जैसे ही हम सकल निवेश के बजाय शुद्ध निवेश पर आते हैं तोऔरऔर भी

यह शेखी बघारने का वक्त नहीं है। अगर हमारे नीति-नियामक भारत के विकास-पथ को लेकर संजीदा नहीं हुए तो हमारी सारी विकासगाथा कायदे से टेक-ऑफ करने से पहले ही मिट्टी में मिल सकती है। हमें चौकन्ना हो जाना चाहिए क्योंकि करीब डेढ़ महीने भर पहले ही 16 मई को रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका की संप्रभु रेटिंग एएए के सर्वोच्च स्तर से घटाकर दूसरे पायदान पर एए1 करऔरऔर भी

शेयर बाज़ार के निवेश में वही कंपनी अच्छा रिटर्न देती है जिसका बिजनेस सालों-साल तक बराबर बढ़ता रहे। लेकिन इसके साथ दो शर्तें जुड़ी हैं। पहली यह कि उसने धंधे में जितनी पूंजी लगाई है, उस पर अच्छा रिटर्न कमाती रहे और दूसरी यह कि वो जितना लाभ कमाए, उसका अच्छा हिस्सा धंधे पर ही निवेश करती रहे। हम आम जीवन में भी यही देखते हैं। कोई खूब कमाए, जमकर खर्च करे। लेकिन न बचाए, न ठीकऔरऔर भी

देश में सबसे भयंकर दुर्दशा डेमोग्राफिक डिविडेंड मानी गई उस युवा आबादी की हो रही है, जिनकी आकांक्षाओं के दम पर भारत की सारी विकासगाथा लिखी गई है। हमारे 60 करोड़ देशवासियों की उम्र 25 साल से कम है। यह वो ताकत है जो देश को आर्थिक महाशक्ति बना सकती है। लेकिन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की ताजा ‘इंडिया इम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024‘ के मुताबिक भारत की श्रमशक्ति में हर साल जुड़नेवाले 70-80 लाखऔरऔर भी

भारत भले ही दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था हो। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि देश में आर्थिक मोर्चे पर सब ठीकठीक चल रहा है। जिस कृषि क्षेत्र पर हमारी 46.1% श्रमशक्ति और करीब 65% आबादी निर्भऱ है, वो तो पहले भी भगवान भरोसे थी और अब भी रामभरोसे ही है। लेकिन जिस सेवा क्षेत्र और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र पर देश की विकासगाथा और विकास-यात्रा को आगे बढ़ाने का दारोमदार है, उसकी ठहरी या पस्तऔरऔर भी