अगर आप शेयर बाज़ार में अच्छी तरह ट्रेड करना चाहते हैं तो आपको मानव मन को अच्छी तरह समझना पड़ेगा। आखिर बाज़ार में लोग ही तो हैं जो आशा-निराशा और लालच व भय जैसी तमाम मानवीय दुर्बलताओं के पुतले हैं। ये दुर्बलताएं ही किसी ट्रेडर के लिए अच्छे शिकार का जानदार मौका पेश करती हैं। निवेश व ट्रेडिंग के मनोविज्ञान पर यूं तो तमाम किताबें लिखी गई हैं। लेकिन उनके चक्कर में पड़ने के बजाय यही पर्याप्तऔरऔर भी

कंपनी कितनी भी अच्छी व मजबूत हो, उसके शेयरों को चढ़े हुए भाव पर खरीदने में कतई समझदारी नहीं है। असल में कंपनी के शेयरों के भाव के दो भाग होते हैं। एक निवेश का और दूसरा सट्टे का। मान लीजिए कि किसी कंपनी का प्रति शेयर मुनाफा (ईपीएस) पिछले चार सालों में 10, 8, 12 व 13 रुपए रहा है। इसके आधार पर तर्कसंगत अनुमान यह हो सकता है कि भविष्य में उनकी अर्जन क्षमता 11औरऔर भी

धन देशी-विदेशी हो या काला सफेद, उसका प्रवाह ही शेयरों के भाव तय करता है। इस प्रवाह की वजह कुछ हो सकती है, कोई अच्छी खबर, भावी संभावना या ऑपरेटरों का मैन्यूपुलेशन। रिटेल ट्रेडर को इसका पता तो ज़रूर होना चाहिए। लेकिन यह उसकी ट्रेडिंग रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पास यह जानकारी तभी आती है जब बाज़ार और शेयरों के भाव इसे सोख चुके हैं। इसलिए उसे मानकर चलना चाहिए कि स्टॉक ट्रेडिंगऔरऔर भी