मांग नहीं, फिर भी उम्मीद में चढ़े शेयर
उपभोक्ता उत्पाद बनानेवाली किसी भी जानी-मानी कंपनी का नाम ले लीजिए। वो लिस्टेड है तो उसके शेयर का हाल बीएसई में देख लीजिए। ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़, हिंदुस्तान यूनिलीवर, वोल्टाज़, एशियन पेंट्स, नेस्ले इंडिया, गोदरेज़ कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, मैरिको व पारले इंडस्ट्रीज़। इस लिस्ट में आप दूसरी भी तमाम जानीमानी उपभोक्ता कंपनियों को शामिल कर सकते हैं। ऊपर ही साफ-साफ दिख जाएगा कि इनके शेयर इस समय पिछली चार तिमाहियों में 50 से ज्यादा पी/ई पर ट्रेड हो रहे हैं।औरऔर भी
घटी साख, भाजपा अमीर, राष्ट्र खोखला!
भारत के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि जो ऊपर-ऊपर दिख रहा है, वो असल में वैसा है या नहीं, इसका कोई भरोसा या ठिकाना नहीं। सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था, जीडीपी में दुनिया की पांचवीं से चौथी और चंद सालों में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने के शोर और धमाकेदार सुर्खियों के झाग के नीचे कोई देखने की जहमत नहीं उठाता कि हमारी टैक्स प्रणाली, सरकारी दखल और न्यायिक से लेकर इन्सॉल्वेंसी जैसीऔरऔर भी
हिल रहे हैं किले, चूलें पड़ रही हैं ढीली!
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि उसकी मुद्रा डॉलर आज भी दुनिया भर की रिजर्व करेंसी बनी हुई है। वहां के वित्तीय बाज़ारों में कुछ हो जाए तो सारी दुनिया हिल जाती है। अमेरिका के ट्रेजरी बॉन्डों पर यील्ड की दर पर दुनिया भर की ब्याज दरें टिकी हुई हैं। जब ऐसे अमेरिका की संप्रभु रेटिंग या साख पर सवाल उठ जाएं तो भारत समेत दुनिया के हर देश को चौकन्ना हो जाने कीऔरऔर भी
अमेरिका का संकट, भारत की मुसीबत!
इस बार मूडीज़ द्वारा अमेरिका की संप्रभु रेटिंग का गिराया जाना कोई सामान्य बात नहीं है। साल 2011 में स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने रेटिंग तब घटाई, जब अमेरिका ने निर्धारित ऋण की सीमा बुरी तरह तोड़ दी थी। 2023 में फिच ने रेटिंग घटाई, जब कोविड महामारी के चलते अर्थव्यवस्था में उथल-पुथल मची हुई थी। लेकिन मूडीज़ ने में रेटिंग तब घटाई है, जब अमेरिका में एक साल से अपेक्षाकृत शांति चल रही है। मुद्रास्फीति व बेरोज़गारीऔरऔर भी






