अच्छे-खासे स्टॉक्स तक को लगती मार
हमारी अर्थव्यवस्था का अच्छा हो या बुरा हो, आज के हालात में शेयर बाज़ार के लिए इसका कोई मतलब नहीं रह गया है। लेकिन विदेशी संस्थागत या पोर्टपोलियो निवेशक (एफआईआई/एफपीआई) अगर शेयर बाज़ार में खरीदने से ज्यादा बेचते हैं तो इसका सीधा असर बाज़ार के सूचकांक और स्टॉक्स पर पड़ता है। चिंता की बात यह है कि पिछले कुछ महीनों से एफआईआई भारतीय शेयर बाज़ार से निकलते जा रहे हैं। एनएसडीएल के डेटा के मुताबिक एफआईआई भारतऔरऔर भी
ब्याज दर, मुद्रास्फीति और विदेशी धन!
हमारे रिजर्व बैंक ने तो ब्याज दरों को मई 2020 से थाम रखा है। लेकिन अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने दिसंबर 2018 से ब्याज दरें नहीं बढ़ाई थीं। हमारा भी मकसद है कि देश में उद्योग व उपभोक्ता को कम ब्याज पर धन मिल सके और निवेश बढ़ने के साथ खपत भी बढ़े। अमेरिका की भी यही सोच रही है। लेकिन अभी जो हालात हैं, उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती नहीं दिख रही। रिजर्व बैंक नेऔरऔर भी
शुरू हो गया ब्याज दर बढ़ाने का क्रम
दुनिया भर का वित्तीय प्रवाह जहां से चलता है, उस अमेरिका ने ब्याज दर बढ़ा दी तो बाकी देशों में भी यह सिलसिला शुरू हो गया है। इसके अगले ही दिन ब्रिटेन के केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड ने ब्याज दर बढ़ा दी। हांगकाग ने भी ब्याज दर बढ़ा दी। दरअसल, दुनिया का हर प्रमुख देश ऐसा करेगा। नहीं तो वहां का धन निकलकर अमेरिका की तरफ भागेगा। अपने यहां भारत में रिजर्व बैंक ने 22 मईऔरऔर भी
तब तेज़ी थी, अब फैला है मंदी का ट्रैप!
बाज़ार जब तेज़ी पर था तो जिस भी कंपनी का शेयर खरीदो, अमूमन बढ़ ही जाता था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। इसलिए हमें अपनी रणनीति बदलनी होगी. निवेश प्रकिया में बेहद सावधानी व अनुशासन बरतना होगा। मूलभूत नियम यह है कि उभरती व मजबूत बिजनेस आधार वाली कंपनी के शेयर जितना हो सके, उतने कम भाव पर खरीदें। बाज़ार में आई गिरावट से अच्छी कंपनियों के शेयर सस्ते में उपलब्ध करा दिए हैं। लेकिन इसऔरऔर भी







