पानी हमेशा नीचे भागता है और अंततः या तो धरती में सोख लिया जाता है या नदी व समुंदर में समा जाता है। लेकिन धन हमेशा ऊपर उसी तरफ भागता है जहां वह ज्यादा बढ़ सकता है। इस समय मुद्रास्फीति पर काबू पाने के लिए अमेरिका समेत तमाम विकसित देश ब्याज दर बढ़ाते जा रहे हैं। इससे वहां के सरकारी बांडों की यील्ड बढ़ गई है और रुपया खोखला होता जा रहा है तो विदेशी निवेशक नौऔरऔर भी

संस्थागत निवेशक शेयर बाजार में कभी भावों को भगवान नहीं मानते। उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे भावों को अपनी खरीद या बिकवाली के दम पर आसमान पर पहुंचा या पाताल तक गिरा सकते हैं। इन संस्थागत निवेशकों में तमाम एफपीआई के साथ-साथ देशी म्यूचुअल फंड और एलआईसी जैसी बीमा कंपनियां शामिल हैं। हां, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ताकत देशी सस्थाओं पर अक्सर भारी पड़ती है। इनका प्रमाण है एचडीएफसी और इन्फोसिस जैसी दमदार कंपनियोंऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में पुराने किस्म के अधिकांश ट्रेडर भावों को भगवान मानते हैं। यह रिटेल ट्रेडर के नज़रिए से एक हद तक सही भी है क्योंकि भावों पर उनका कोई वश नहीं होता। जिस तरह दरिया में दो-चार जग ही नहीं, कई बाल्टी भी पानी डाल देने से कोई फर्क नहीं पड़ता, उसी तरह रिटेल ट्रेडरों की खरीद-फरोख्त का शेयरों के भाव पर कोई खास असर नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है बांध का पानी खोलने से। मुश्किलऔरऔर भी

शेयरों के भावों को कभी दिल पर नहीं लेगे, उनको लेकर भावुक नहीं होंगे, तभी उनके पैटर्न को समझ सकते हैं। देखने की पहली चीज यह है कि किसी शेयर में फिलहाल सटोरियों की कितनी सक्रियता है। यह उसमें डिलीवरी वाले सौदों के प्रतिशत से पता चल जाता है। बीएसई व एनएसई की वेबसाइट हर शाम इसकी जानकारी दे देती है। अगर ऐसे सौदे 60-70% से ज्यादा है तो यह उन्हें खरीदने का पहला सिग्नल है। बाकीऔरऔर भी

शेयर बाज़ार लिस्टिंग कंपनियों के उठते-गिरते भावों का ही खेल है। यहां आधे से ज्यादा सौदे तो सटोरियों के होते हैं, जिनका सचमुच खरीदने-बेचने से कोई वास्ता नहीं होता। वे तो बस भाव बोलते हैं और दिन के दिन में भावों का अंतर काटकर निकल जाते हैं। मसलन, शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज़ में डिलीवरी वाले सौदे 45.44%, विप्रो में 42.19%, टाइटन में 46.67% और भारती एयरटेल में 33.59% ही थे। वैसे, डिलीवरी वाले सौदों का आधे सेऔरऔर भी