दुनिया की अर्थव्यवस्था में इस समय एकदम अलग तरह का बदलाव हो रहा है। वैश्विक कंपनियां अपने माल के लिए चीन से बाहर का कोई ठौर खोज रही हैं। इस मांग का छोटा-सा हिस्सा भी भारत को मिल गया तो हमारी बहुत सारी कंपनियों की चांदी हो सकती है। लेकिन इस अवसर का फायदा उठाने के लिए क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत होगी और इसके लिए पूंजी निवेश चाहिए। पूंजी निवेश वही कंपनियां कर सकती हैं जिन परऔरऔर भी

कभी तेज़ी तो कभी मंदी के बीच हिचकोले खाता हमारा शेयर बाज़ार आखिर लम्बी तेज़ी का हाईवे कब पकड़ सकता है? इसका जवाब सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश के चक्र से जुड़ा हुआ है। साल 2003 से 2007 के बीच देश में जमकर पूंजी निवेश का चक्र चला तो उस दौरान बीएसई सेंसेक्स सात गुना बढ़ गया, जबकि बीएसई स्मॉलकैप सूचकांक तो 16 गुना चढ़ गया। जानकार मानते हैं कि हम फिलहाल वैसे ही पूंजी निवेश केऔरऔर भी

वैसे तो शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग से लेकर निवेश तक में सफलता का सारा खेल प्रायिकता पर निर्भर है। लेकिन आज के दौर में जब पलड़ा न इधर भारी हो न उधर, तब प्रायिकता या प्रोबैबिलिटी पर आधारित रणनीति ही सबसे माकूल हो सकती है। प्रायिकता की गणना सांख्यिकी का विषय है। लेकिन आम बोलचाल में हम इसे किसी स्टॉक या सूचकांक के बढ़ने की संभावना और गिरने की आशंका से समझ सकते हैं। यह भी एकऔरऔर भी

ट्रेडर भागते हैं तो निवेशक संभाल लेते हैं और निवेशक भागते हैं तो ट्रेडर आगे आ जाते हैं। शायद यही वजह है कि अपने यहां अक्टूबर 2021 से विदेशी पोर्टपोलियो निवेशकों के बराबर निकलते रहने के बावजूद शेयर बाज़ार धराशाई नहीं हुआ। भारतीय निवेशकों व ट्रेडरों में अभी तक कहीं न कहीं आस बची हुई है। अमूमन, जब हर तरह के निवेशकों व ट्रेडरों पर तेज़ी का सुरूर सवार हो जाता है, तब तेजी का नया दौरऔरऔर भी

शेयर बाज़ार में कभी-कभी छोटी अवधि के ट्रेडरों के साथ ही लम्बे समय के निवेशक भी खरीद रहे होते हैं। अपने यहां एकाध महीने से शायद कुछ ऐसा ही हो रहा है। लेकिन ऐसा ज्यादा नहीं चल सकता। इसका स्पष्ट संकेत देती है डेरिवेटिव सेगमेंट में इस्तेमाल की जा रही मार्केट वाइड पोजिशन लिमिट (MWPL), जो बराबर स्वीकृत सीमा के 12-15% के बीच ही झूल रही है। यह दिखाती है कि ट्रेडर अब भी पोजिशन लेने याऔरऔर भी