ग्लोबल दौर में कहां है बाज़ार की ठौर!
निवेश की दुनिया भांति-भांति के निवेशकों से भरी पड़ी है। निवेशक भी एक तरह के ट्रेडर हैं और ट्रेडर भी एक तरह के निवेशक। केवल साल-महीने और दिनों का ही तो फर्क है। ऊपर से आज समूची दुनिया के शेयर बाज़ार एक ही डोर में बंध चुके हैं। अमेरिका से निकला धन, वहां के शेयर बाज़ार से उठी लहर यूरोप, एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक को अपने लपेटे में ले लेती है। अमेरिकी शेयर बाज़ार की गिरावट याऔरऔर भी
नहीं सामाजिक सुरक्षा तो बचत मजबूरी!
भारत में यूरोपीय देशों जैसी सामाजिक सुरक्षा होती तो आम लोगों को बचत के लिए मगज़मारी नहीं करनी पड़ती। ऊपर से वहां की सरकारें टैक्स का धन अवाम को संकट से बचाने के लिए खर्च करती हैं, जबकि अपने यहां सरकार हर आपदा में टैक्स बढ़ाने के अवसर खोजती है। कच्चे तेल के दाम पिछले आठ साल में बराबर घटते रहे। इधर बढ़ने के बावजूद 2014 से कम हैं। फिर भी हमारी सरकार ने पेट्रोल-डीज़ल व रसोईऔरऔर भी
खबरें अच्छी हैं, खुशखबरी नदारद क्यों?
हमारा शेयर बाजार जिस तरह बढ़ते-बढ़ते गिरने लगा है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक खरीदते-खरीदते बेचने लगे हैं, उसमें ऐसी कोई उम्मीद नहीं बनती कि निफ्टी-50 जल्दी ही नया शिखर बनाने जा रहा है? वैसे भी जब तक रिटेल ट्रेडरों का भरोसा बाज़ार में नहीं बनता और निवेशक मौका पाते ही मुनाफा निकालने लगते हैं, तब तक बाज़ार में कोई भी तेज़ी लम्बी नहीं खिंच सकती। लेकिन बाज़ार में एक सिद्धांत और चलता है कि जब रिटेल ट्रेडरऔरऔर भी
बाज़ार में उछल-कूद, ट्रेडरों ने बांधे हाथ
अपने यहां मार्च 2020 में कोरोना के क्रैश के बाद शेयर बाज़ार में तेज़ी का जो दौर शुरू हुआ, उसमें रिटेल निवेशक झूमकर बाज़ार में आए। उन्हें गहरा यकीन था कि बाज़ार को बढ़ना ही बढ़ना है। इस दौरान जब भी बाज़ार गिरा, उन्होंने खरीद बढ़ा दी। उनकी यह पहल मुख्य रूप से म्यूचुअल फंडों की इक्विटी स्कीमों के ज़रिए हुई। इसमें इतना दम था कि विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) की बिकवाली को वह पचाती गई। अबऔरऔर भी







