ठीक एक हफ्ते बाद बुधवार, 1 फरवरी को नए वित्त वर्ष 2023-24 का बजट आना है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि इस बार का बजट अगले 25 सालों का टेम्प्लेट तय कर देगा। इसलिए सारा देश बड़ी बेसब्री से देख रहा है कि इस बार वे अर्थव्यवस्था के विकास का क्या खाका पेश करती हैं जिस पर अगले ढाई दशकों की भव्य इमारत खड़ी की जाएगी। यकीनन इस बार भी पूंजीगत व्यय कोऔरऔर भी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और केंद्र सरकार का दावा है कि हमारी अर्थव्यवस्था बमबम कर रही है और आगे भी शानदार गति से बढ़ेगी। लेकिन दरअसल, सब अंधेरे में तीर मार रहे हैं। किसी को कुछ साफ नहीं दिख रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 11 दिन पहले देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों, अधिकारियों व विशेषज्ञों के साथ बैठक की। बैठक का विषय था – वैश्विक प्रतिकूलताओं के बीच भारत का विकास और दमखम। उनका कहना था किऔरऔर भी

मुद्रास्फीति या महंगाई ने भले ही आम लोगों का बजट खराब कर दिया हो। लेकिन इसने सरकार का बजट एकदम चकाचक कर दिया है। बढ़ी मुद्रास्फीति की कृपा ने केंद्र सरकार इस बार बजट में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 6.4% तक सीमित रखने का लक्ष्य हासिल कर लेगी और तमाम अर्थाशास्त्रियों से लेकर राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों तक को कहने का मौका नहीं देगी कि वह खर्चशाह हो गई है और ऋणम् कृत्वा, घृतम पीवेत कीऔरऔर भी

हमें शेयर बाज़ार में निवेश करने से पहले भलीभांति समझ लेना चाहिए कि कंपनियां निवेशकों के स्वामित्व वाली सामाजिक इकाई हैं जिनका मकसद है अपने निवेशकों द्वारा लगाई गई पूंजी पर रिटर्न को अधिक से अधिक करते जाना। रिटर्न का यूं बढ़ना कंपनियों के शेयर के भावों में झलकता है, भले ही वे कंपनियां लिस्टेड हों या न हों। हां, लिस्टेड कंपनियों में सहूलियत यह होती है कि उनके शेयर के भाव हर दिन स्टॉक एक्सचेंज मेंऔरऔर भी