देश की घरेलू बचत लगातार घट रही है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक हमारी सकल घरेलू बचत वित्त वर्ष 2018-19 में 60,00,390 करोड़ रुपए हुआ करती थी। यह 2019-20 में 59,95,942 करोड़ रुपए और 2020-21 में 55,92,446 करोड़ रुपए रह गई। बाद का सरकारी आंकड़ा अभी तक नहीं आया है। लेकिन मोतीलाल ओसवाल फाइनेंस की एक रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष 2022-23 में सितंबर 2022 तक की छमाही में हमारी सकल घरेलू बचत दर जीडीपीऔरऔर भी

इधर कॉरपोरेट क्षेत्र पर ऋण का बोझ खूब घटा है। साथ ही बैंकों के एनपीए कम हो गए हैं क्योंकि उन्होंने पिछले छह सालों में 11.17 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डाल दिए। मगर, दिक्कत यह कि इन्हीं छह सालों में पहले आर्थिक सुस्ती और फिर कोरोना की मार से किसानों से लेकर आम उपभोक्ता तक ज्यादा कर्जदार हो गया है। यकीनन, बड़े कॉरपोरेट घरानों और उनके आला कर्मचारियों के साथ ही सरकारी कर्मचारियों कीऔरऔर भी

भारत के सामने अब मुद्रास्फीति को थामना नहीं, बल्कि आर्थिक विकास दर को बढ़ाना बड़ी चुनौती है। रिटेल मुद्रास्फीति की दर नवंबर में 5.88% थी। यह दिसंबर में और घटकर 5.72% हो गई है। यह काफी सुखद संकेत है। लेकिन दुखद बात यह है कि देश में औद्योगिक निवेश नहीं बढ रहा। वह भी तब, जब मोदी सरकार जब देश के भौतिक और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को लगातार बेहतर बनाने के साथ ही उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन (पीएलआई)औरऔर भी

विषम और विकट स्थितियों में सामान्य नियम काम नहीं करते। मसलन, किसी देश का मुद्रा अगर अगर डॉलर व यूरो के मुकाबले कमज़ोर होती है तो माना जाता है कि उस देश का निर्यात बढ़ जाएगा क्योंकि उसका माल इन देशों में डॉलर में सस्ता हो जाएगा। इधर कुछ महीनों भारतीय रुपया डॉलर और यूरो दोनों के ही खिलाफ काफी कमज़ोर हुआ है। डॉलर पहले 75 रुपए का हुआ करता था, अब 82 रुपए का मिल रहाऔरऔर भी

कंपनी का अतीत देखा-परखा जा सकता है। तमाम टूल्स व फॉर्मूले भी हैं जिनसे उसका भविष्य आंका जा सकता है। यह काम कोई दूसरा आपके लिए कर सकता है। लेकिन तीन पहलू ऐसे हैं जिन्हें निवेश करने से पहले खुद आपको समझना पड़ता है। पहला यह कि कंपनी का बिजनेस मॉडल क्या है और उसमें विकास की कितनी गुंजाइश है? दूसरा यह कि उसका प्रबंधन कैसा है? प्रबंधन का काबिल होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि यह भीऔरऔर भी