समय-मूल्य निकालें तो मात्र 2-3% रिटर्न!
शेयर बाज़ार के व्यवहार से जुड़े लोग बताते हैं कि यहां से लम्बे समय के निवेशक दरअसल कुछ खास नही कमाते। वे केवल मुद्रास्फीति के असर को सोख पाते हैं। लम्बा निवेश, चाहे वो किसी स्टॉक में हो या म्यूचुअल फंड की इक्विटी स्कीम में, अच्छी से अच्छी स्थिति में अमूमन उसका सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न 12-14% से ज्यादा नहीं होता। धन के समय मूल्य को न देखें और बीच के समय को काटकर सीधे-सीधे आज की तुलनाऔरऔर भी
शेयर बाज़ार से सचमुच कमाता कौन है
बाज़ार को समझना है तो उससे जुड़े इंसान को समझना होगा, बाज़ार से कमाना है तो उससे जुड़े उन इंसानों को समझना होगा जो यहां से बराबर कमाते रहते हैं। यहां से दो तरह के लोग कमाते हैं। एक लम्बे समय के निवेशक और दूसरे छोटी अवधि के ट्रेडर। यह भी कहा जाता है कि शेयर बाज़ार में 95% ट्रेडर गंवाते और केवल 5% ट्रेडर ही कमाते हैं। लेकिन सच्चाई को अपने आसपास के व्यवहार से समझनेऔरऔर भी
समझना होगा बाज़ार से जुड़े इंसान को
शेयर बाज़ार कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि व्यवहार की चीज़ है। जो भी यहां ट्रेडिंग से कमाना चाहते हैं, उन्हें इसके व्यावहारिक पहलुओं से ज्यादा मतलब होना चाहिए। हालांकि ट्रेडिंग सीखनी है तो सैद्धांतिक पहलुओं को भी थोड़ा-थोड़ा समझकर ही आगे बढ़ सकते हैं। सैद्धांतिक पहलुओं पर भरपूर सामग्री इंटरनेट पर मिल जाती है जिसे गाहे-बगाहे पढ़ते रहना चाहिए। लेकिन असली पहलू है व्यावहारिक जिसे हम केवल और केवल अपने अभ्यास से ही साध सकते हैं। एक बातऔरऔर भी
बन सकते हैं धन के समुद्र के गोताखोर
शेयर बाज़ार किसी गूढ़ मंत्र से बंधा नहीं, न ही इसे सीखना कोई रॉकेट साइंस है। फाइनेंस न जाननेवाला शख्स भी इसमें पारंगत हो सकता है। लेकिन इसकी दो मूलभूत शर्तें हैं। एक, अपनी भावनाओं पर नियंत्रण और दो, जो जैसा है उसे वैसा देखने की खुली बुद्धि। ये दोनों ही शर्तें नियमित अभ्यास से पूरी की जा सकती है जिसे हम साधना भी कह सकते हैं। अपने यहां जिस तरह बेरोगगारी की समस्या बेलगाम होती जाऔरऔर भी
शेयरों में निवेश मिटाए महंगाई की मार
सारी दुनिया में इस समय महंगाई विकट समस्या बन गई है। सितंबर में अपने यहां थोक मुद्रास्फीति की दर 10.70% और रिटेल मुद्रास्फीति की दर 7.41% रही है। इसी दौरान अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर 8.2%, यूरो ज़ोन में 9.9% और ब्रिटेन में 10.1% रही है। वहां यह दो-चार साल नहीं, करीब चार दशकों का उच्चतम स्तर है। बड़े-बड़े देशों की मुद्राएं भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरती जा रही हैं। अपना रुपया भी इस साल डॉलरऔरऔर भी









