हमारे मौसम विभाग का तर्क है कि यकीनन अल-निनो की तलवार इस बार के मानसून के सिर पर अटकी है। लेकिन कुछ कारक उसके असर को निष्क्रिय कर सकते हैं। इसमें से एक प्रमुख कारक हिंद महासागर का डाइपोल (आईओडी) है। इसके अंतर्गत होगा यह कि अरब सागर में तापमान गरम थोड़ा रहेगा। इससे अगस्त से सितंबर तक भारत में नमी ज्यादा रहेगी और भरपूर बारिश होगी। इससे अल-निनो का असर काफी कम हो जाएगा। केंद्र सरकारऔरऔर भी

इस बार औसत बारिश नहीं होने की आशंका निजी मौसम निगरानी संस्था स्काईमेट ने भी जताई है। उसका आकलन है कि इस बार मानसून सामान्य नहीं, बल्कि उससे कमज़ोर रहेगा और बारिश औसत की 94% ही हो सकती है। ऐसा अल-निनो के चलते होगा। इसके असर से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में काफी कम बारिश होगी और सूखे के हालात बन सकते हैं। नतीज़तन, खरीफ की फसलों पर बुरा असर पड़ेगा। धान से लेकर मोटेऔरऔर भी

आशावाद अच्छी चीज़ है। लेकिन इसे झूठ नहीं, सच आधारित होना चाहिए। विश्व बैंक व आईएमएफ से लेकर रेटिंग एजेंसियों के आकलन के विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक कहता है कि हमारी अर्थव्यवस्था ज्यादा बढ़ेगी। इसी तर्ज में मौसम विभाग भी कह रहा है कि इस बार मानसून में दीर्घकालिक औसत (एलपीए) की 96% बारिश होगी, जिसे सामान्य माना जाएगा। उसके मुताबिक, अल-निनो का असर हुआ भी तो जुलाई से सितंबर तक की अवधि के आखिरी हिस्से मेंऔरऔर भी

बिजनेस करना खेती करने जैसा आसान नहीं कि खेत तैयार कर बीज डाल आए, खाद-पानी व कीटनाशक का बराबर इंतजाम किया और मौसम ठीक रहा तो तय समय पर फसल काटकर घर ले आए। बिजनेस में भी व्यापार करना अपेक्षाकृत आसान है जिसमें थोक के भाव माल खरीदकर रिटेल के भाव में बेच मुनाफा कमा लिया जाता है। बिजनेस करने की असली चुनौती है मैन्यूफैक्चरिंग में, जिसमें फैक्टरी लगाकर आप उत्पादन करते हो। कच्चा माल हासिल करनेऔरऔर भी

शेयर बाज़ार हमें ट्रेडिंग और निवेश से कमाने का मौका ही नहीं देता, वो हमें देश की अर्थव्यवस्था के अंग-अंग के साथ ही दुनिया की अर्थव्यवस्था और वित्तीय जगत को भी जानने-समझने को उकसाता है क्योंकि हम देश-दुनिया के आर्थिक व वित्तीय हालात को जितनी अच्छी तरह से जानेंगे, शेयर बाज़ार से जुड़े हमारे फैसले उतने ही सटीक हो सकते हैं। हमें जानना चाहिए कि मौसम विभाग ने इस बार मानसून में 4% कम बारिश की आशंकाऔरऔर भी