लम्बे निवेश में सट्टा नहीं, चले विश्लेषण
एक बात हमें अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि हम कितनी भी मशक्कत कर लें, निवेश में सफलता रातोंरात नहीं मिलती। इसके लिए समय, अनुशासन व धैर्य की दरकार होती है। अगर आपको लगता है कि शेयर बाज़ार से खटाखट नोट कमाने का कोई फॉर्मूला है तो यह विचार फौरन जेहन से निकालकर दूर फेंक दें। साथ ही हमें निवेश और सट्टेबाज़ी के अंतर को साफ समझ लेना चाहिए। शेयर बाज़ार में ट्रेडिंग एक तरह का सट्टाऔरऔर भी
कम श्रम भागीदारी, ऊपर से बेरोज़गारी!
भारत जैसा शानदार डेमोग्रैफिक डिविडेंड वाला देश अगर अपनी पूरी श्रमशक्ति का उपयोग नहीं कर रहा है तो अर्थव्यवस्था अपनी संपूर्ण संभावना कतई नहीं हासिल कर सकती। हम दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दम भरते हैं। लेकिन ‘द इकनॉमिस्ट’ पत्रिका के मुताबिक दुनिया में केवल नौ देश हैं जहां बेरोज़गारी की दर भारत से ज्यादा है। ये देश हैं ग्रीस, इटली, स्पेन, तुर्किए, ब्राज़ील, चिली, कम्बोडिया, मिस्र व सऊदी अरब। वो भी तब, जबऔरऔर भी
श्रमशक्ति की ऐसी उपेक्षा क्यों है देश में!
इतनी विपुल श्रमशक्ति वाले भारत में श्रम की इतनी उपेक्षा क्यों? अपने यहां अमेरिका या अन्य विकसित देशों की तरह ज्यादातर लोग रोज़गार दफ्तरों से काम मांगने नहीं जाते। फिर भी सीएमआईई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी) के मुताबिक देश में इस वक्त करीब 5 करोड़ लोग काम करने को उत्सुक हैं, मगर उन्हें काम नहीं मिल रहा। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में 2017-18 में बेरोजगारी की दर 6.1% के साथ 45 सालों के उच्चतम स्तरऔरऔर भी
भारत जैसी श्रमशक्ति विश्व में कहीं नहीं
जिस देश की 68% या दो-तिहाई आबादी 15 से 64 साल, एक चौथाई या 25% आबादी 14 साल तक के बच्चों की हो और महज 7% आबादी 65 साल से ऊपर के बूढ़ों की है, वह बेहद भाग्यशाली है। बच्चे तो परिवार के साथ पल जाते हैं, जबकि बूढ़ों को कामकाज़ी लोगों द्वारा पालना होता है। भारत सरकार ने सामाजिक सुरक्षा से पल्ला झाड़ रखा है या बीमा कंपनियों के मत्थे मढ़कर बाज़ार के हवाले कर दियाऔरऔर भी






