शेयर बाज़ार चार महीने से कदमताल ही किए जा रहा है। आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहा। बहुत सारे निवेशकों व ट्रेडरों को लगता था कि उथल-पुथल भरे साल 2022 के बाद 2023 उठाव का साल होगा। लेकिन न तो अभी तक ऐसा हुआ है और न आगे ऐसा होने के कोई आसार दिख रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका अगले छह महीनों में मंदी की शिकार हो सकती है। विश्व अर्थव्यवस्था पर अनिश्चितताऔरऔर भी

विश्व बैंक ने अपनी एक नई रिपोर्ट में कहा है कि 2023 से 2030 के बीच विश्व की औसत विकास दर 30 साल के न्यूनतम स्तर 2.2% सालाना पर आ सकती है। चालू सदी के पहले दशक में यह औसत दर 3.5% सालाना रही थी। विश्व बैंक का कहना है कि विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को ज्यादा ही झटका लग सकता है। साल 2000 से 2010 तक के दशक में उनकी जो औसत आर्थिक विकास दर 6%औरऔर भी

पिछले नौ सालों से भरपूर सरकारी संरक्षण में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की पुरज़ोर कोशिशें हो रही हैं। वैसे,  ऐसा कर पाना संभव नहीं दिखता। लेकिन इतने सालों में सरकार ने इतना ज़रूर किया कि भारत के आर्थिक विकास को हिंदू विकास दर पर ज़रूर ला पटका। हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर अक्टूबर-दिसंबर 2022 की तिमाही में मात्र 4.4% रही है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और शिकागो यूनिवर्सिटी में फाइनेंस के प्रोफेसर, रघुराम राजन काऔरऔर भी

भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाना किसी आर्थिक योजना का नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को भुनाने का एक राजनीतिक छलावा है, जुमला है। हम इसे हासिल भी कर लें तो प्रति व्यक्ति 3472 डॉलर सालाना की मध्यम आय वाला देश ही बने रहेंगे। रिजर्व बैंक के गवर्नर रह चुके ख्यात अर्थशास्त्री सी. रंगराजन का कहना है कि विकसित व उच्च-मध्यम आय वाला देश बनने के लिए हमारी प्रति व्यक्ति आय कम से कम 13,205औरऔर भी