क्लाउडिया गोल्डिन ने अमेरिका ही नहीं, दुनिया के सौ से ज्यादा देशों के डेटा के गहन विश्लेषण से ऐसे तथ्य निकाले हैं जिन्होंने महिलाओं की श्रम भागीदारी के बारे में सदियों से चले आ रहे मिथकों को तोड़ दिया। माना जाता था कि आर्थिक विकास व औद्योगिकीकरण से श्रम बाज़ार में महिलाओं का आना बढ़ता जाएगा। गोल्डिन ने बताया कि हकीकत यह है कि 19वीं सदी में औद्योगिकीकरण से पहले महिलाएं बाहर ज्यादा काम करती थीं। लेकिनऔरऔर भी

इस साल अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार हार्वर्ड विश्वविद्यालय की 77 साल की प्रोफेसर क्लाउडिया गोल्डिन को श्रम बाज़ार में महिलाओं की भूमिका की बेहतर समझ विकसित करने के लिए मिला है। पुरस्कार समिति के अध्यक्ष जैकब स्वेनसन का कहना है कि यह समझ समाज के लिए बेहद अहम है और क्लाउडिया गोल्डिन की रिसर्च से हमें उन तमाम कारकों व बाधाओं का गहरा अहसास हुआ है जिन्हें भविष्य में सुलझाने की दरकार है। प्रोफेसर गोल्डिन ने 200औरऔर भी

एक तरफ देश के आमजन पर कर्ज और देनदारियों का बोझ बढ़ रहा है। दूसरी तरफ उनकी वित्तीय आस्तियां घटती जा रही हैं। नतीजा यह है कि बीते वित्त वर्ष 2022-23 में आमजन या हाउसहोल्ड की शुद्ध बचत 47 सालों के न्यूनतम स्तर जीडीपी के 5.1% पर आ गई। साल भर पहले 2021-22 में यह जीडीपी की 7.2% हुआ करती थी। यह सच रिजर्व बैंक ने सितंबर 2023 की मासिक बुलेटिन में उजागर किया है। लेकिन वित्तऔरऔर भी

ब्रोकरों से लेकर शेयर बाज़ार के पंटरों, पण्डों, एनालिस्टों और रेटिंग एजेंसियों तक की फितरत बहती गंगा में हाथ धोने की है। वे ट्रेडरों व निवेशकों को उन्माद से निकालने के बजाय यही संदेश देते हैं कि चढ़ जा बेटा सूली पर, भला करेंगे राम। बढ़े हुए स्टॉक्स में ट्रेड करना रिटेल ट्रेडरों के लिए सुरक्षित रणनीति हो सकती है, लेकिन फूले हुए गुब्बारे में और हवा भरना अच्छा नहीं। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने बैंकिंग क्षेत्र कीऔरऔर भी

अजीब-सा दुष्चक्र है। उधर, बैंक खासकर सरकारी बैंक आम लोगों की बचत से कॉरपोरेट क्षेत्र को दिए गए ऋण राइट-ऑफ करके बट्टेखाते में डाल रहे हैं। इधर आम लोगों को अपना खर्च पूरा करने के लिए जहां-तहां से उधार लेना पड़ रहा है। घटती आमदनी और बचत के बीच उनकी देनदारियां बढ़ती जा रही हैं। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 में देश के आम परिवारों पर कुल 9 लाख करोड़ रुपए का ऋणऔरऔर भी