बचत आमजन की, खेला चला बैंकों का
सरकारी बैंकों ने जितनी भी रिकवरी हो, उसे घटाने के बाद वित्त वर्ष 2017-18 में उन्होंने शुद्ध रूप से 1.18 लाख करोड़ रुपए के ऋण बट्टेखाते में डाले। हालांकि बट्टेखाते में शुद्ध रूप से डाली गई यह रकम घटते-घटते वित्त वर्ष 2021-22 में 0.91 लाख करोड़ रुपए और 2022-23 में 0.84 लाख करोड़ रुपए रह गई। लेकिन इससे बाज़ार में एक तरह का असंतुलन पैदा हो गया। सरकारी बैंकों की होड़ में टिकने के लिए निजी बैकोंऔरऔर भी
राइट-ऑफ से खाता साफ तो बढ़ा लाभ
हमारे बैंकों ने अप्रैल 2014 से मार्च 2023 तक के नौ सालों में सरकार की सहमति से 14.56 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के डूबत ऋण या एनपीए राइट-ऑफ कर दिए हैं। यह जानकारी खुद केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री भागवत कराड ने लोकसभा में दो महीने पहले 8 अगस्त को दी है। जो 14,56,226 करोड़ रुपए के बैंक ऋण राइट-ऑफ किए गए हैं, उसमें से 7,40,968 करोड़ रुपए यानी 50.88% ऋण बड़ी कंपनियों के हैं। मालूम हो किऔरऔर भी
ऊंची दुकान फीके पकवान, बैंक चमके!
भारतीय शेयर बाजार की तेज़ी सारी दुनिया के निवेशकों को खींचे पड़ी है। सभी यहां निवेश करने को लालायित हैं। लेकिन सवाल उठता है कि हमारे बाज़ार की तेज़ी का सत्व क्या है और हवाबाज़ी कितनी है? पहली बात निफ्टी-50 में बैकिंग व वित्तीय सेवाओं का भार सबसे ज्यादा 33.95% है। इस तरह इसका 1/3 से ज्यादा हिस्सा वास्तविक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व नहीं करता, जिसमें मैन्यूफैक्चरिंग से लेकर कृषि, व्यापार व आईटी जैसी अन्य सेवाएं शामिल हैं।औरऔर भी
जीडीपी विकास में लोचा, कंपनी दमदार
कंपनियों की बैलेंसशीट में हमेशा आस्तियों और देनदारियों का अलग-अलग जोड़ बराबर होता है। इसी तरह किसी देश के जीडीपी की गणना करते वक्त उत्पादन या आय को कुल व्यय के बराबर होना चाहिए। सिद्धांत कहता है कि अर्थव्यवस्था में अर्जित आय को खर्च के बराबर होना चाहिए क्योंकि उत्पादक व सेवाप्रदाता की आय तभी होती है, जबकि दूसरा उसके उत्पाद व सेवाएं खरीदता है। भारत में जीडीपी की गणना के लिए आय या उत्पादन का तरीकाऔरऔर भी






