चुनावी लोकतंत्र की राजनीति में झूठ से सत्ता हासिल की जा सकती है क्योंकि जनता की याददाश्त लम्बी नहीं होती और भारत जैसे आस्था-प्रधान देश में लोगों को आसानी से भावनाओं में बहकाया जा सकता है। हालांकि यहां भी काठ की हांड़ी बार-बार नहीं चढ़ती। लेकिन अर्थनीति में झूठे दावे देश की आर्थिक बुनियाद को ही खोखला कर सकते हैं और सच उजागर होने पर सबसे तेज़ गति से बढ़ती हमारी अर्थव्यवस्था भी धराशाई हो सकती है।औरऔर भी

कई महीनों से बैंकों से उधार लेनेवाले बढ़ रहे हैं, जबकि बैंकों में डिपॉजिट कम गति से बढ़ रही है। क्रेडिटयेज़ रेटिंग की एक रिपोर्ट के मुताबिक 22 मार्च 2024 को खत्म पखवाड़े में बैंकों द्वारा दिए गए उधार 20.2% बढ़कर ₹164.3 लाख करोड़ हो गए, जबकि बैंकों की जमा 13.5% ही बढ़कर ₹204.8 लाख करोड़ पर पहुंच सकी। उसके बाद रिजर्व बैंक के सबसे ताज़ा आंकड़ों पर नज़र डालें तो 5 अप्रैल को खत्म पखवाड़े मेंऔरऔर भी

भारतीय बैंक इस समय 20 सालों की सबसे विकट डिपॉजिट समस्या से जूझ रहे हैं। इस समय क्रेडिट-डिपॉजिट या सीडी अनुपात 80% हो चुका है जो साल 2005 के बाद से अब तक का उच्चतम स्तर है। सीडी अनुपात दिखाता है कि बैंकों का कितना डिपॉजिट ऋण देने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। हमारे बैंक बीते वित्त वर्ष 2023-24 में डिपॉजिट खींचने के लिए जूझते रहे। हालत यह है कि लोगबाग होम लोन से लेकरऔरऔर भी

प्रधानमंत्री के पद पर बैठा कोई शख्स आर्थिक मसलों पर झूठ बोलने लग जाए तो तीन साल में भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और 2047 तक विकसित देश बनाने का संकल्प महज चुनावी झांसा व जुमला लगने लगता है। निवेश को ट्रैक करनेवाली फर्म प्रोजेक्ट्स टुडे के ताज़ा डेटा के मुताबिक मार्च में खत्म हुए वित्त वर्ष 2023-24 में भारत में निजी क्षेत्र का निवेश 15.3% घटा है। निजी क्षेत्र की निवेश योजनाओं में सबसेऔरऔर भी