दुख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय। जो दुख में सुमिरन करे, दुख काहे को हो। दुर्दिन में कोई किसी को नहीं पूछता। जीवन और समाज का यह नियम शेयर बाज़ार पर भी लागू होता है। जिन कंपनियों के सितारे बुलंदी पर होते हैं, उनके पीछे हर कोई भागता है। इसलिए उनके शेयर चढ़ते ही चले जाते हैं। वहीं, किसी समय बुलंदी पर रही कंपनी जब किसी मुसीबत या तात्कालिक वजह से गिरने लगतीऔरऔर भी

बाज़ार की शक्तियां जितना मुक्त होकर काम करेंगी, उनकी दक्षता उतनी ही अधिक होगी। लेकिन रिजर्व बैंक देश के भीतर ही नहीं, देश के बाहर भी रुपए से जुड़े करेंसी डेरिवेटिव्स को कंट्रोल करने की फिराक में है। उसने इसी साल अप्रैल में प्रस्ताव रखा ताकि वो ऑफशोर बगैर-डिलीवरी वाले फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाज़ार पर नियंत्रण कर सके। उसका कहना है कि इस बाज़ार में सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म (ईटीएफ) उसके पास पंजीयन कराएं क्योंकि इन पर भारतऔरऔर भी

बाज़ार जितना विकसित, जितने ज्यादा भागीदार और वोल्यूम जितना ज्यादा, उसमें ताकतवर शक्तियों द्वारा जोड़-तोड़ करने की गुंजाइश उतनी ही कम हो जाती है। यह बात आम बाज़ार के साथ ही शेयर व करेंसी बाज़ार समेत समूचे वित्तीय बाज़ार पर लागू होती है। नियामक संस्थाओं का काम बाज़ार का नियंत्रण नहीं, बल्कि नियमन है ताकि वो अच्छी तरह विकसित हो सके। लेकिन इस साल के शुरू में बैंकिंग व मुद्रा क्षेत्र के नियामक रिजर्व बैंक ने ऐसाऔरऔर भी

कहा और माना जाता है कि अपने यहां रुपया पूरी तरह बाज़ार के हवाले हैं, फ्लोटिंग विनिमय दर की व्यवस्था है। लेकिन ऐसा है नहीं। रिजर्व बैंक बराबर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपए की विनिमय दर को मैनज करता है। रुपया ज्यादा न गिरे, इसके लिए विदेशी मुद्रा भंडार से बाज़ार में डॉलर डाल देता है और रुपया ज्यादा न चढ़े, इसके लिए बाज़ार से डॉलर खींच लेता है। हालांकि वो कहता है कि विनिमय दर कीऔरऔर भी

ग्लोबल होती जा रही दुनिया में देश की मुद्रा का कमज़ोर होना कोई बुरी बात नहीं, बशर्ते वो देश आयात से ज्यादा निर्यात करता हो। लेकिन रुपए का कमज़ोर होते जाना भारत के लिए कतई अच्छा नहीं है क्योंकि हमारा निर्यात सीमित है और हम कहीं ज्यादा आयात करते हैं। यह उन भारतीय परिवारों के लिए भी बुरा है जो अपने बच्चों को अमेरिका या यूरोप पढ़ने के लिए भेजते हैं। डॉलर की तो बात ही छोड़िए,औरऔर भी