जिस तरह नोटबंदी के घोषित लक्ष्य और असली मकसद अलग-अलग थे, उसी तरह जनधन खातों का असली मकसद देश के वंचित दबकों को सशक्त बनाना कतई नहीं था। अजीब बात है कि करोड़ों लोगों के पास कमाई के साधन और पेट भरने को अनाज नहीं, उनके बैंक खाते खोलने का ढोल बजाया जा रहा है! घर में नहीं है दाने, अम्मा चली भुनाने। सरकार भलीभांति जानती है कि किसानों को सौगात नहीं, फसलों का वाजिब दाम चाहिए,औरऔर भी

यह महज संयोग नहीं कि जो राज्य शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं तक में सबसे पिछड़े और प्रति व्यक्ति आय में सबसे नीचे हैं, वहां सबसे ज्यादा जनधन खाते खोले गए हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 9.45 करोड़ जनधन खाते खोले गए हैं। उसके बाद 6 करोड़ खातों के साथ बिहार का नंबर है। ये दोनों ही राज्य प्रति व्यक्ति आय में देश के 33 राज्यों व संघशासित क्षेत्रों में सबसे निचले पायदान पर हैं। इसऔरऔर भी

आज के दौर में डिमांड हो तो कोई भी सप्लाई लेकर पहुंच जाता है। लेकिन सप्लाई ही सप्लाई हो और डिमांड न हो तो धंधा ही नहीं, अर्थव्यवस्था तक बैठ जाती है। इसमें भी अगर सप्लाई का इंतज़ाम सरकार की तरफ से किया जा रहा हो तो इसका फायदा तंत्र से चिपकी जोंकों को ही होता है, व्यापक अवाम को नहीं। प्रधानमंत्री जनधन योजना का भी यही हाल है। हर जनधन खाते के साथ प्रधानमंत्री जीवन ज्योतिऔरऔर भी

कमाल की बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद मानते हैं कि वे श्रेय की राजनीति करते हैं। 9 फरवरी को राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव में उहोंने कहा था, “गांधी जी कहते थे श्रेय और प्रिय। हमने श्रेय का रास्ता चुना।” अनजाने में कही यह बात उनकी हर हरकत में झलकती है। मगर, दिक्कत यह है कि उपलब्धियों का श्रेय लेने में वे झूठ की अति कर देते हैं। लेकिन कमियों-खामियों पर फूटीऔरऔर भी

नेकी कर दरिया में डाल। यह महज एक कहावत नहीं, बल्कि भारत की लम्बी परम्परा है। इतिहास गवाह है कि रेगिस्तान से घिरे, पानी को तरसते राजस्थान में जब वहां के सेठों ने पक्की बावडियां बनवाईं तो उन पर कहीं नाम नहीं लिखवाया। लोगों ने बहुत कहा तो वे बावड़ी की तलहटी में अपना नाम लिखवाने को तैयार हुए। लेकिन आज वही भारत है, जहां ऐसा प्रधानमंत्री है जो देश में किए गए हर छोटे-बड़े काम काऔरऔर भी