मोदी सरकार ने दस साल के शासन में अर्थव्यवस्था के कुशल वित्तीय प्रबंधन का नगाड़ा बहुत बजाया है। लेकिन हकीकत में यह ढोल के भीतर की पोल और भयंकर कुप्रबंधन है। वित्तीय प्रबंधन का बड़ा सटीक पैमाना होता है राजकोषीय़ घाटा। बीते वित्त वर्ष 2023-24 में तमाम जोड़तोड़ के बावजूद देश का राजकोषीय घाटा जीडीपी का 5.63% रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस पर खूब अपनी पीठ थपथपाई। मगर यह 2012 से 2019 के दौरानऔरऔर भी

देश महज नारों से नहीं चलता। हकीकत देश के सबसे ताकतवर शख्सियत प्रधानमंत्री की भी नहीं सुनती। ऐसा होता तो भारतीय अर्थव्यवस्था अभी 3.5 ट्रिलियन नहीं, 5 ट्रिलियन डॉलर की बन चुकी होती, किसानों की आय दो साल पहले 2022 में ही दोगुनी हो चुकी होती और देश में पिछले दस सालों में 20 करोड़ नए रोज़गार पैदा हो चुके होते। इसलिए भारत को 2047 तक विकसित देश बना देने के नारे की हकीकत हमें समझनी होगी।औरऔर भी

कोई देश अमीर तो कोई देश गरीब क्यों होता है? क्या इसकी वजह भौगोलिक या सांस्कृतिक होती है या कुछ दूसरे कारक इसका फैसला करते हैं? इसका जवाब तलाशते तीन अर्थशास्त्रियों जेम्स रॉबिन्सन, डैरन एसमोग्लू और साइमन जॉनसन को इस बार अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। इसकी वजह भौगोलिक या सांस्कृतिक नहीं हो सकती। अन्यथा, भारत 18वीं सदी के मध्य तक अमेरिका से अमीर और हमारा औद्योगिक उत्पादन अमेरिका से ज्यादा नहीं होता। नोबेल पुरस्कारऔरऔर भी

यूं तो शेयर बाज़ार की दशा-दिशा और अलग-अलग शेयरों के भाव बहुत सारे कारकों से प्रभावित होते हैं। इनमें घरेलू अर्थव्यवस्था से लेकर वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर अमेरिका व चीन की स्थिति और उनकी मौद्रिक नीति तक शामिल है। साथ ही एक बड़ा कारक यह है कि बाज़ार या शेयर में धन का प्रवाह या निकासी कैसी चल रही है। इधर माना जा रहा है कि भारत से भागने में लगे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हमारे केमिकल क्षेत्र मेंऔरऔर भी