बाज़ी हाथ से सरकती जा रही है। सामाजिक नीति व अर्थनीति ही नहीं, राजनीति तक में। दस साल तक देश में जिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तूती बोलती थी, आज जब वे पोलैंड और यूक्रेन के दौरे से वापस देश लौटते हैं तो गिनती के दो अधिकारी उन्हें रिसीव करने पहुंचते हैं। अफसरशाही में लैटेरल एंट्री का फैसला लेते हैं, लेकिन अंदर-बाहर के दवाब में उन्हें चंद दिनों में ही वापस लेना पड़ता है। यूट्यूबर को रोकनेऔरऔर भी

आर्थिक विकास को समझना और निवेश करना है तो हमें नॉमिनल और रीयल या मौजूदा मूल्यों पर दिख रहे ऊपर-ऊपर के आंकड़े और स्थिर मूल्यों पर निकाले गए असली आंकड़े का अंतर साफ समझना होगा। नहीं तो कोई भी हमें चरका दे देगा। जैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार 15 अगस्त को लालकिले से बखाना कि हम प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करने में सफल हुए हैं। लेकिन नहीं बताया कि किसने साल में और सतहीऔरऔर भी

समाचार एजेंसी रॉयटर्स की मानें तो भारत में सालाना ₹30 लाख से ज्यादा कमानेवाले अमीर परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2020-21 के 1.07 करोड़ से 2030-31 तक बढ़कर 3.5 करोड़ हो सकती है। दूसरी तरफ साल में ₹1.25 लाख से भी कम कमानेवाले गरीब परिवारों की संख्या वित्त वर्ष 2020-21 के 4.52 करोड़ से घटते-घटते 2030-31 में 1.99 करोड़ और 2046-47 तक मात्र 72 लाख पर आ सकती है। तब देश के ज्यादातर गरीब परिवार ग्रामीण इलाकोंऔरऔर भी

भारत का मध्य वर्ग पिछले दस साल से मोदी सरकार और भाजपा का समर्थक रहा है क्योंकि उसे लगता था कि वो आर्थिक विकास को गति देकर रोज़ी-रोज़गार व समृद्धि के अवसर पैदा करेगी। लेकिन अब उसे लगने लगा है कि मोदी सरकार इसके बजाय अपने मुठ्ठी भर यारों पर देश के संसाधन लुटा रही है, जबकि मध्य वर्ग की हालत खस्ता है और उसे अपनी गाढ़ी कमाई पर लगातार ज्यादा से ज्यादा टैक्स देना पड़ रहाऔरऔर भी