आईपीओ के बुलबुलों से सतर्क-सावधान
पिछले कई सालों से भारतीय निवेशकों के लिए बुलबुलों का दौर चल रहा है। पहले क्रिप्टो करेंसी। इसके बाद स्मॉल-कैप स्टॉक्स पर दांव लगाने का जुनून। फिर रेलवे से लेकर डिफेंस क्षेत्र तक की सरकारी कंपनियों ने गदर काटा। अब निवेशकों में आईपीओ का उन्माद। असल में जब भी शेयर बाज़ार तेज़ी पर होता है तो माहौल को भुनाने के लिए कंपनियां चीलों और मर्चेंट बैंकर उनके सेनानी कौओं की तरह नादान निवेशकों के झुंड पर टूटऔरऔर भी
बाज़ार हवाले नहीं कर सकते हेल्थकेयर
हेल्थकेयर को कभी भी बाज़ार शक्तियों के हवाले नहीं किया जा सकता क्योंकि वो बाजार के नियमों से नहीं चलता। उसमें अनिश्चितता व विपत्ति के पहलू हैं। उसे हमदर्दी व सम्वेदना के बिना कतई नहीं चलाया जा सकता। यह भी गौरतलब है कि भारत में हेल्थकेयर एक ऐसा क्षेत्र है जहां रेग्युलेशन न के बराबर है। कोई भी कहीं भी अस्पताल या नर्सिंग होम खोल सकता है और किसी की कोई जवाबदेही नहीं। यही वजह है किऔरऔर भी
टैक्स उगाही में आगे, हेल्थकेयर से भागे
अपने देश में टैक्स का धन यूनिवर्सल हेल्थकेयर की पब्लिक फंडिंग में नहीं, बल्कि निजी बीमा कंपनियों और अस्पतालों का धंधा बढ़ाने में जा रहा है। सभी मानते ज़रूर हैं कि हेल्थकेयर की सुविधाएं देना सरकार का काम है और निजी क्षेत्र से इसकी उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन यह भी तो सच है कि प्राइवेट हेल्थकेयर क्षेत्र को सरकार ने ज़मीन से लेकर टैक्स जैसी तमाम सुविधाओं में भारी सब्सिडी दे रखी है। इससे हुआ यहऔरऔर भी
यूनिवर्सल हेल्थकेयर अब तक क्यों नहीं?
आज़ादी के समय से ही देश में यूनिवर्सल हेल्थकेयर का ख्वाब देखा गया। लेकिन 77 साल बाद भी हर तरफ स्वास्थ्य सेवाओं का अकाल है। अब दावा किया जा रहा है कि 2030 तक देश में सबको यूनिवर्सल हेल्थकेयर उपलब्ध कराने का लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा और 70 साल से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को आयुष्मान योजना के तहत लाना इसी लक्ष्य की तरफ बढ़ा कदम है। लेकिन केवल स्वास्थ्य बीमा से क्या होगा? क्या इससेऔरऔर भी






