नौकर मालिक की सेवा करता है क्योंकि इससे उसका दाना-पानी चलता है। नौकरशाह सरकार की बंदगी करता है क्योंकि वहीं से उसे मौज के साधन मिलते हैं। लेकिन अर्थशास्त्री के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं। फिर भी वी. अनंत नागेश्वरन अपने पेशे की गरिमा ताक पर रख मोदी सरकार और उसके कॉरपोरेट आकाओं की सेवा में लिप्त हैं। वे रिटेल मुद्रास्फीति से खाने-पीने की चीजों को हटा कोर मुद्रास्फीति को लाना चाहते हैं ताकि रिजर्व बैंक बेधड़कऔरऔर भी

सरकार के नीति-नियामकों को लगता है कि अगर देश में खाने-पीने की चीजों को हटाकर कोर मुद्रास्फीति को अपना लिया जाए तो कहीं कोई ऐतराज़ नहीं नहीं करेगा। वे समझा देंगे कि हमारे यहां रिटेल मुद्रास्फीति तय करनेवाले उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खाने-पीने की चीजों का भार 46% है, जबकि अमेरिका में यह 15%, यूरोप में 20% और यहां तक ब्राज़ील, चीन व दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स देशों में भी 20-25% है। इसलिए भारत में इस विसंगतिऔरऔर भी

सरकार और रिजर्व बैंक, दोनों चाहते हैं कि खाने-पीने की चीजों के दाम मुद्रास्फीति के लक्ष्य से हटा दिए जाएं क्योंकि मौद्रिक नीति से मांग घटाने का मसला हल किया जा सकता है, सप्लाई बढ़ाने का नहीं। खाद्य वस्तुओं के दाम तो सप्लाई बढ़ाकर ही घटाए जा सकते हैं, जिस पर न रिजर्व बैंक का वश है और न ही सरकार का। दरअसल, जब जलवायु परिवर्तन दुनिया भर में बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा बनता जा रहा है, तबऔरऔर भी

अगर मोदी सरकार ने अपने मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की सलाह मान ली तो देश की मौद्रिक नीति बनाते वक्त खाने-पीने की चीजों की महंगाई को किनारे कर दिया जाएगा। यह 145 करोड़ आबादी वाले उस महादेश में होगा जो ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) के पैमाने पर दुनिया के 125 देशों में 111वे नंबर पर है, जहां भूख गंभीर समस्या है और जहां के 81.35 करोड़ लोग हर महीने सरकार से मिलने वाले पांच किलोऔरऔर भी

वी. अनंत नागेश्वरन ढाई साल से मौजूदा भारत सरकार या मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार है, भारत के नहीं। अगर भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार होते तो कभी ऐसी बात नहीं कहते कि, “भारत में सालाना एक लाख रुपए से कम कमानेवाले परिवारों के युवाओं की मानसिक सेहत बेहतर है जो नियमित व्यायाम करते हैं, परिवार में घनिष्ठता है और कभी-कभार ही अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, बनिस्बत उन युवाओं से जिनकी सालाना पारिवारिक आय 10 लाखऔरऔर भी