डिपॉजिट घटने के दोषी आम लोग नहीं
बैंकों में डिपॉजिट के घटने की क्या वजहें हो सकती हैं? आम लोगों पर दोष मढ़ देना बड़ा आसान है कि बैंकों में अपनी बचत रखने के बजाय वे उसे अब शेयर बाज़ार व म्यूचुअल फंड में लगा रहे हैं। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जो लोग शेयर बाज़ार व म्यूचुअल फंड में निवेश कर रहे हैं, उनमें से ज्यादातर ऐसे युवा हैं जो बैंकों में कभी धन रखते ही नहीं थे। बैंकों में पारम्परिक रूपऔरऔर भी
बढ़ता असंतुलन बैंक जमा व उधार का!
एक तरफ विकसित भारत का सपना। दूसरी तरफ लोगों की घटती जमा और बढ़ते उधार। एचडीएफसी बैंक की रिसर्च रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में उधार व जीडीपी के अनुपात की तुलना एशिया के अन्य देशों से करें तो यह अनुपात चीन तो छोड़िए थाईलैंड और मलयेशिया जैसे देशों से भी कम है। साथ ही जिस तरह के कड़े लिक्विडिटी कवरेज अनुपात (एलसीआर) की पेशकश रिजर्व बैंक ने कीऔरऔर भी
दो दशकों की विकटतम डिपॉजिट तंगी
देश इस समय विचित्र स्थिति से गुजर रहा है। तेज आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी है कि बैंक बेधड़क उद्योग-धंधों को उधार दे सकें। इसके लिए ज़रूरी है कि खुद बैंकों के डिपॉजिट अच्छी गति से बढ़ते रहें। लेकिन देश के निजी से लेकर सरकारी बैंक तक सभी डिपॉजिट की तंगी से जूझ रहे हैं। इससे उधार देने की उनकी क्षमता सीमित हो गई है। निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक, एचडीएफसी बैंक ने हाल ही मेंऔरऔर भी
धन बढ़ने के झांसे और सच को समझें
कोई कहे कि आपका धन कुछ महीने या एकाध साल में दोगुना कर देगा तो उस पर यकीन न करें। कोई कहे कि पांच साल में दोगुना कर देंगे तो गिन लीजिए कि इसका सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न (सीएजीआर) 14.87% बनता है। सरकार बोले कि उसने दस साल में जीडीपी दोगुना कर दिया है तो समझिए कि सालाना विकास की दर 7.18% ही रही है। धन के बढ़ने के झांसे से बचना बहुत ज़रूरी है। हाल ही मेंऔरऔर भी






