हल्ला है कि देश की अर्थव्यवस्था बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इसका सबूत है कि लोगबाग जमकर टैक्स दे रहे हैं और सरकार भी दिल खोलकर खर्च कर रही है। पश्चिम एशिया का संकट भारत का बाल बांका भी नहीं कर सका। वित्त मंत्रालय के अधीन करनेवाले महालेखा नियंत्रक (सीजीए) ने 31 जुलाई को डेटा जारी किया कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जून की पहली तिमाही में भारत सरकार ने 13.57 लाख करोड़ रुपए खर्च किया है। यह बजट में साल भर के लिए निर्धारित कुल 53.47 लाख करोड़ रुपए के व्यय का 25.4% है, जबकि साल भर पहले की समान अवधि में उसने बजट में निर्धारित व्यय का 24.1% ही खर्च किया था। इस बार का सरकारी खर्च साल भर पहले से 11% अधिक है। फिर भी सरकार के खजाने की स्थिति दुरुस्त है। जून 2026 की तिमाही में केंद्र का राजस्व 10.49 लाख करोड़ रुपए रहा है। साफ है कि सरकार का खर्च उसकी आमदनी से 3.08 लाख करोड़ रुपए ज्यादा है जिसे वो ऋण लेकर पूरा करती है जो देश के राजकोषीय घाटे में गिना जाता है। पहली तिमाही में केंद्र की राजस्व प्राप्तियां बजट में निर्धारित रकम की 28.7% रही हैं। इसमें से राज्यों का हिस्सा देने के बाद केंद्र को शुद्ध रूप से मिला टैक्स राजस्व 6.37 लाख करोड़ रुपए है जो साल भर पहले से 17.8% ज्यादा है…
इस दौरान केंद्र को 3.78 लाख करोड़ गैर-टैक्स राजस्व और 35,003 करोड़ रुपए सरकारी संपत्तियां बेचकर मिले हैं। लेकिन सरकार को मिला 3.78 लाख करोड़ रुपए का गैर-टैक्स राजस्व साल भर पहले से मात्र 1.2% ज्यादा है। वो भी तब, जब इसमें में से 2.87 लाख करोड़ रुपए रिजर्व बैंक से रिकॉर्ड लाभांश के रूप में मिले हैं। टैक्स राजस्व में प्रत्यक्ष टैक्स से सरकार को जमकर राजस्व मिला है। इस दौरान कॉरपोरेट टैक्स संग्रह 19.7% बढ़ा है। हालांकि केंद्र को 2.07 लाख करोड़ रुपए का ही कॉरपोरेट टैक्स मिला है, जबकि व्यक्तिगत इनकम टैक्स से उसे इससे ज्यादा 3.05 लाख करोड़ मिले हैं। मतलब, ऊपर-ऊपर सब चकाचक है और कॉरपोरेट क्षेत्र पर सरकार की मेहरबानी बनी हुई है। लेकिन देश में आमजन से लिए गए परोक्ष या अप्रत्यक्ष टैक्स – जीएसटी के अलग हिस्सों को मिलाकर देखें तो देश की अर्थव्यवस्था की दारुण स्थिति साफ हो जाती है। पता चलता है कि यह सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ का शोर मचाकर देश को किस तरह पर-निर्भर बनाती जा रही है। हालांकि वो इस पतित हरकत तक से अपना खज़ाना भरने से बाज़ नहीं आ रही।
चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से लेकर जुलाई तक हर महीने सरकार को आयात से मिलनेवाला जीएसटी सबसे ज्यादा बढ़ा है। सरकार देश में हो रहे आयात को राज्यों के बीच होने वाली सप्लाई मानती है और इस पर इंटरस्टेट जीएसटी या आईजीएसटी लगाती है। अप्रैल में सरकार को कुल 2,42,702 करोड़ रुपए का जीएसटी मिला था जो साल भर पहले से 8.7% ज्यादा था। इसका 27.32% हिस्सा (57,580 करोड़ रुपए) आयात पर लगे आईजीएसटी से आया जो साल भर पहले से 25.8% ज्यादा था। इसी दौरान देश के भीतर से मिला कुल जीएसटी मात्र 4.3% बढ़कर 1,85,122 करोड़ रुपए पर पहुंचा। मई में भी यही किस्सा दोहराया गया। इस दौरान सरकार को जीएसटी से कुल 1,94,184 करोड़ रुपए मिले जो साल भर पहले से मात्र 3.2% ज्यादा थे। इसका 30.72% हिस्सा (59,654 करोड़ रुपए) आयात पर लगे आईजीएसटी से आया जो साल भर पहले से 19.1% ज्यादा था। तब देश के भीतर से मिला कुल जीएसटी बढने के बजाय 2.6% घटकर 1,34,530 करोड़ रुपए रह गया था।
जून में सरकार को कुल 1,94,812 करोड़ रुपए का जीएसटी मिला जो साल भर पहले से 13.9% ज्यादा था। लेकिन इसका 30.82% हिस्सा (60,038 करोड़ रुपए) आयात पर लगे आईजीएसटी से आया जो साल भर पहले से 34.6% बढ़ा था। इस दौरान देश के भीतर से मिला कुल जीएसटी मात्र 6.5% बढ़कर 1,34,774 करोड़ रुपए पर पहुंचा। 1 अगस्त को घोषित ताज़ा आंकड़ों की बात करें तो जुलाई में सरकार को कुल 2,11,205 करोड़ रुपए जीएसटी से मिले हैं जो साल भर पहले से 15.4% ज्यादा हैं। लेकिन इसका 31.49% हिस्सा (66,511 करोड़ रुपए) आयात से मिले आईजीएसटी से आया जो साल भर पहले से 28.8% ज्यादा है। वहीं, इस दौरान देश के भीतर से मिला कुल जीएसटी साल भर पहले 10.1% बढ़कर 1,44,695 करोड़ रुपए पर पहुंचा।
सरकार का जीएसटी बढ़ रहा है आयात के दम पर
| (₹ करोड़) | अप्रैल 2026 | सालाना वृद्धि | मई 2026 | सालाना वृद्धि | जून 2026 | सालाना वृद्धि | जुलाई 2026 | सालाना वृद्धि |
| घरेलू जीएसटी | 1,85,122 | 4.3% | 1,34,530 | -2.6% | 1,34,774 | 6.5% | 1,44,695 | 10.1% |
| आयात पर आईजीएसटी | 57,580 | 25.8% | 59,654 | 19.1% | 60,038 | 34.6% | 66,511 | 28.8% |
| सकल जीएसटी | 2,42,702 | 8.7% | 1,94,184 | 3.2% | 194,812 | 13.9% | 2,11,205 | 15.4% |
स्रोत: भारत सरकार
चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से जुलाई तक के पांच महीनों में केंद्र सरकार का सकल जीएसटी संग्रह 8,42,903 करोड़ रुपए है। यह साल भर पहले की समान अवधि के 7,65,607 करोड़ रुपए से 10.1% ज्यादा है। लेकिन गौर करने की बात यह है कि इस बार मिले सकल जीएसटी में 2,43,783 करोड़ रुपए या 28.92% का योगदान आयात पर मिले आईजीएसटी का है। यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है। यह दिखाता है कि देश में आम लोगों की खपत ठंडी पड़ी है, जबकि सरकार आयात के दम पर अपना खज़ाना भर रही है। उस आयात के दम पर, जिसके लिए देश को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है और जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बचाने का भाषण देते हैं। यह वही विदेशी मुद्रा है जिसकी कमी को पूरा करने के लिए रिजर्व बैंक को अनिवासी भारतीयों की जमा को खींचने के लिए विशेष स्कीम चलानी पड़ी है।
सरकारी कृपा और धंधे पर चल रही संस्थाएं भी दबी जुबान से जीएसटी संग्रह की आयात निर्भरता पर चिंता जता रही हैं। मसलन, अर्न्स्ट एंड यंग की भारतीय इकाई ईवाई इंडिया का कहना है, “प्रतिकूल वैश्विक हालात में जीएसटी में चल रही दहाई अंकों की वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती को दिखाता है। लेकिन आयात से मिल रहे ज्यादा जीएसटी को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। दिक्कत यह है कि पिछले कुछ सालों में तमाम पीएलआई स्कीमों के बावजूद घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग बराबर ठंडी पड़ी है।” इसी वजह से देश को आम खपत से लेकर औद्योगिक उपयोग की ज़रूरतें पूरी करने के लिए बाहर से आयात करना पड़ रहा है। इस मौके का फायदा उठाकर चीन अब भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझीदार बन गया है। वो अपने माल से भारतीय बाज़ार को पाटता जा रहा है, जबकि भारत के पास चीन को निर्यात करने लिए कुछ खास नहीं है। बीते वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 116.12 अरब डॉलर था। इस साल जून तक के छह महीनो में ही चीन ने भारत को 79.41 अरब डॉलर का माल बेचा है, जबकि भारत ने उसे 12.31 अरब डॉलर का निर्यात किया। इस तरह उसके साथ हमारा व्यापार घाटा अभी से 67.10 अरब डॉलर हो गया है। बेहयाई की हद देखिए कि प्रधानमंत्री मोदी अब भी हैंडलूम का नाम लेकर स्वदेशी के लिए रील बनाते फिर रहे हैं।
ये है मोदी सरकार के टैक्स संग्रह और औद्योगिक विकास का हाल। फिर जमकर खर्च करने के उसके हो-हल्ले का क्या फायदा? आखिर उसका सारा खर्च किस खोह में जा रहा है? चालू वित्त वर्ष 2026-27 की जून या पहली तिमाही में उसने कुल 13.57 लाख करोड़ रुपए खर्च किया है। इसमें से 10.17 लाख करोड़ रुपए (74.94%) राजस्व व्यय है, जो पुराने ऋणों के ब्याज चुकाने, मुफ्त राशन से लेकर खाद सब्सिडी देकर मतदाताओं को लुभाने और सरकार चलाने पर खर्च हुआ है। यही वो मद है जिससे सरकार छात्रों पर चलाने के लिए पैलेट गन खरीदती है, मंत्रियों-संत्रियों की अय्याशी और प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का खर्च निकलता है। कितनी अजीब बात है कि 2021 से 2026 में अब तक के करीब पांच साल में प्रधानमंत्री मोदी की फालतू विदेश यात्राओं पर 557.51 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन पिछले एक दशक में देश के 94,000 सरकारी स्कूल इसलिए बंद कर दिए गए, क्योंकि उन्हें चलाने के लिए सरकार के पास धन नहीं था।
मोदी सरकार डंका बजाती है कि वो पूंजीगत व्यय जमकर बढ़ा रही है। लेकिन एक तो उसका पूंजीगत व्यय बजट में निर्धारित कुल व्यय का मात्र 22.85% है, दूसरे 2023-24 से 2026-27 के मौजूदा वित्त वर्ष तक यह व्यय जीडीपी के 3.2% से 3.1% पर ही अटका पड़ा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 का कुल निर्धारित पूंजीगत व्यय 12.22 लाख करोड़ रुपए है। इसका 27.85% हिस्सा या 3.40 लाख करोड़ रुपए उसने पहली तिमाही में खर्च किया है। इसमें से 1.01 लाख करोड़ रुपए के तो उसने लोन बांटे हैं। इस धन की बंदरबांट कैसे हो रही है, इसका एक ताज़ातरीन उदाहरण यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले साल नवंबर में निजी क्षेत्र के लिए एक लाख करोड़ रुपए का जो रिसर्च, डेवलपमेंट व इनोवेशन (आरडीआई) फंड लॉन्च किया था, उसके पहले राउंड में 2192 करोड़ रुपए गहन टेक्नोलॉज़ी के शोध के लिए 22 निजी कंपनियों में बांटे गए। इसमें से 1377 करोड़ रुपए (62.82% हिस्सा) ऐसी 15 कंपनियों को दिया गया जो 12 सदस्यीय चयन समिति के सात सदस्यों से किसी न किसी रूप में जुड़ी हुई थीं।
मोदी सरकार के बारह साल के शासन में ऐसे भ्रष्टाचार के घनेरों उदाहरण मिल जाएंगे। लेकिन मीडिया से लेकर न्यायपालिका तक को सरकार ने ऐसा साधा है कि बड़े से बड़े भ्रष्टाचार को विभाजक राजनीति के शोर में दबा दिया जाता है। अपने जिस खर्च के दम पर सरकार देश की अर्थव्यवस्था को दाग-धब्बों को छिपा रही है, उसमें भी वो भ्रष्टाचार की भरपूर गुंजाइश बनाए रखती है। शिक्षा व स्वास्थ्य में ज्यादा खाने-कमाने की गुंजाइश नहीं है औ पढ़ा-लिखा व स्वस्थ भारत सही सवाल पूछना सीख जाएगा कि तो मोदी सरकार ने सत्ता संभालने के बारह सालों में शिक्षा पर बजट का हिस्सा 4.6% से घटाकर 2.5% और स्वास्थ्य पर खर्च 1.9% से घटाकर 1.4% कर दिया। कौशल विकास के इतने शोर के बावजूद 2015-16 से 2025-26 तक इससे जुड़े मंत्रालय पर बजट का मात्र 0.05% हिस्सा खर्च किया जा रहा है।
वहीं, लूटने-खाने की ज्यादा गुंजाइश होने के कारण इन्हीं बारह सालों के दौरान बजट में सड़क व राजमार्ग मंत्रालय का हिस्सा तीन गुने से ज्यादा किया जा चुका है। मनमोहन सिंह सरकार के आखिरी साल 2013-14 में बजट का 1.8% हिस्सा सड़क व राजमार्ग मंत्रालय को दिया गया था, जबकि मोदीराज के बारहवें साल 2025-26 में यह हिस्सा 5.8% हो चुका है। इस मंत्रालय पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष रह चुके नितिन गडकरी का राज है। उनका ई-20 का भ्रष्टाचार अभी सुलग रहा है। कब फट जाए, कहा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवैध घोषित की जा चुकी इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम से सबसे ज्यादा चंदा गडकरी के मंत्रालय की देखरेख में भाजपा को मिला था। जब कभी देश में टूटे पुलों, सड़कों और धंस गए राजमार्गों का स्वतंत्र ऑडिट होगा, तब पला चलेगा कि अकेले इस मंत्रालय में कितने अरबों-खरबों का भ्रष्टाचार हुआ है। बेहद राष्ट्रीय शर्म और दुर्भाग्य की बात है कि भ्रष्टाचार के इस गंदे धंधे के लिए देश को ऋण के दलदल में डुबाया जा रहा है। पिछले बारह सालों में सरकार पर चढ़ा कुल आंतरिक व बाह्य ऋण साढ़े तीन गुना हो चुका है। मार्च 2014 में यह 55.87 लाख करोड़ रुपए था, जबकि मार्च 2026 में 197.18 लाख करोड़ रुपए हो चुका है और मार्च 2027 तक इसके बढ़कर 214.82 लाख करोड़ रुपए हो जाने का बजट अनुमान है।
