देश में पहले मुद्रास्फीति की दो ही दरें हुआ करती थीं। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित थोक मुद्रास्फीति और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित रिटेल मुद्रास्फीति। अब इसमें एक तीसरी भी जुड़ गई है उत्पादकों के मूल्य सूचकांक (पीपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति। लेकिन ये सभी बैंकिंग, कॉरपोरेट क्षेत्र और वित्तीय तंत्र के लिए मायने रखती हैं, जबकि देश के आमजन के लिए इनका कोई खास मतलब नहीं। उसके लिए तो सालों-साल से ‘महंगाई डायन खाये जात है’ की स्थिति बनी हुई है। मुद्रास्फीति जितनी बढ़ती है, उससे ज्यादा कमाई बढ़ जाए तो किसी को महंगाई से फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जब कमाई ठहरी या घट रही हो तब मुद्रास्फीति का 4% बढ़ना भी घर-गृहस्थी की कमर तोड़ देता है। सरकार कहती है कि उसने तो पिछले बारह सालों में मुद्रास्फीति को काबू में कर रखा है। रिजर्व बैंक ने अगस्त 2016 से फ्लेक्सिबल इनफ्लेशन टार्गेटिंग (एफआईटी) फ्रेमवर्क के तहत रिटेल मुद्रास्फीति के लिए 4% को बीच में रखकर 2% ऊपर-नीचे यानी 2% से 6% की जो रेंज घोषित की है, वो अभी तक टूटी नहीं है। यह फ्रेमवर्क हर पांच साल पर बढ़ाया जाता है। अभी इसे 31 मार्च 2031 तक बढ़ा दिया गया है। जून में रिटेल मुद्रास्फीति की दर 17 महीनों के शिखर 4.38% पर पहुंच गई। फिर भी रिजर्व बैंक की निर्धारित रेंज में ही है। जुलाई माह की रिटेल मुद्रास्फीति 12 अगस्त को घोषित की जाएगी।
सरकार और रिजर्व बैंक का कहना है कि एफआईटी का फ्रेमवर्क हमारे लिए एकदम फिट है। 2016 में इसे अपनाने से पहले देश में रिटेल मुद्रास्फीति की औसत दर 8% के आसपास हुआ करती थी, जबकि इसके बाद के दस सालों में मुद्रास्फीति की औसत दर घटकर 4.8% पर आ गई है। किसी भी विकासशील देश के लिए इतनी मुद्रास्फीति एकदम फिट और वाजिब है। रिटेल मुद्रास्फीति में रोजमर्रा के इस्तेमाल की खाने-पीने की चीजों और हाउसिंग, पानी, बिजली, गैस व अन्य ईंधनों का भार 54.41% है। इसलिए यह आमजन पर महंगाई के असर का सही आईना है। खाद्य व ईंधन के भाव खराब मानसून के चलते फसल चौपट होने और कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में उछाल से बढ़ सकते हैं। ऐसे कारकों पर रिजर्व बैंक का कोई कंट्रोल नहीं। इसलिए वो चाहकर भी मुद्रास्फीति का लक्ष्य शून्य नहीं रख सकता। ऐसें में बहुत सोच-समझकर उसने मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4±2% निर्धारित किया है और अब तक बखूबी उसका पालन कर रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब सब कुछ इतना दुरुस्त है, मुद्रास्फीति नियंत्रण में है तो आमजन हमेशा महंगाई की मार से त्राहिमाम क्यों करते रहते हैं?
असल में सरकार और उसके नीति-नियामक जिस मुद्रास्फीति को संभालने में लगे रहते हैं, उससे देश के आम उपभोक्ता का कोई लेना-देना नहीं होता। वो तो हमेशा यही देखता है कि क्या उसकी जेब और बजट में समा रहा है और क्या उससे बाहर निकल जा रहा है। वह देखता है कि चीजें जितनी महंगी हुई हैं, उसकी कमाई उतनी बढ़ी है कि नहीं। वो किसी एक महीने या साल की नहीं, कई सालों की महंगाई को एक साथ जोड़कर देखता है। शादी-ब्याज को छोड़ दें तो वो कभी सोना नहीं खरीदने जाता। दुनिया की जानी-मानी निवेश बैंकिंग फर्म जेपी मॉर्गन के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में दाम पिछले तीन सालों में दोगुने से ज्यादा हो जाने के बावजूद सोने की सालाना मांग 720 टन के आसपास बनी हुई। इस साल जनवरी से मार्च 2026 के बीच इसका 50% हिस्सा सोने की ईंटों व सिक्कों के रूप में निवेश के लिए आयात किया गया। तीन साल पहले यह मात्र 30% हुआ करता था। आखिर कौन से भारतीय है जो दाम दोगुने होने के बावजूद सोने में निवेश बढ़ाते जा रहे हैं? कम से कम वे देश के आम उपभोक्ता नहीं सकते।
आम उपभोक्ता का वास्ता तो अपने जीवन-यापन से रहता है। इसके बाद कमाई से कुछ बच जाए, तभी वे कमेटी, एफडी या एसआईपी जैसा कोई छोटा-मोटा निवेश करते हैं। बाकी तो उनका हमेशा यही रोना रहता है कि दाम एक बार बढ़ गए तो फिर कभी नीचे नहीं आते। वो देखता है कि अमूल का जो एक लीटर देशी घी 2014 में 350 रुपए में आता था, वो आज 2026 में तमाम डिस्काउंट के बाद भी 640 रुपए में मिल रहा है। बारह साल में 82.86% की वृद्धि। महीने की रिटेल मुद्रास्फीति नीति-नियामकों के लिए मायने रखती है। आमजन तो साल-दर-साल जोड़कर हिसाब लगाता है। इसमें दवाओं से लेकर रोज़मर्रा की चीजें, किराया-भाड़ा, पढाई और आने-जाने का खर्च तक शामिल है। वो जोड़ता है कि इस खर्च के साथ उसकी कमाई कितनी बढ़ी या घटी है। इस पैमाने पर पिछले बारह सालों में भारत का आम आदमी दुखी ही होता गया है, भले ही सरकार दावा करती रहे कि मुद्रास्फीति के असर को हटा देने के बाद भी देश का जीडीपी जमकर बढ़ता रहा है।
सरकार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित रिटेल मुद्रास्फीति को उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही चीजों व सेवाओं का बास्केट बनाकर नापती है। वो देखती है कि किसी महीने में ठीक साल भर पहले से इस बास्केट के दाम कितने बढ़े हैं। हम सभी अपने अनुभव से जानते हैं कि अमूमन दाम एक बार बढ़ जाएं तो फिर साल-दर-साल नीचे नहीं आते। अपने यहां तो विचित्र स्थिति है कि दुनिया में कच्चे तेल के दाम घट जाने के बावजूद सरकार पेट्रोल-डीजल के दाम घटने नहीं देती। वो ऐसी स्थिति को कस्टम व एक्साइज़ ड्यूटी बढ़ाकर अतिरिक्त कमाई के अवसर के रूप में इस्तेमाल करती है। देश का आमजन सब कुछ देखते-समझते हुए भी असहाय बना रहता है। वो महंगाई को एक महीने या साल से नहीं, सालों के असर के रूप में देखता है। खुद सरकारी आंकड़ों से भी आमजन पर पड़ती मार का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
पिछले बारह साल में अब तक माह-दर-माह रिटेल मुद्रास्फीति की जो दर रही है, उसके क्रमवार असर को जोड़कर हिसाब लगाएं तो देश का आम उपभोक्ता जिन चीजों को अप्रैल 2014 में 100 रुपए में खरीदता था, उनके दाम अप्रैल 2026 में अब तक 175 रुपए हो चुके हैं। वहीं, अप्रैल 2019 से अप्रैल 2026 के बीच दाम 41% बढ़े हैं। सरकारी मुद्रास्फीति के बजाय वो जब अपने ऊपर पड़ रही महंगाई की इस मार को महसूस करता है, तब सरकारी डेटा उसे क्रूर मजाक जैसा नजर आता है। सरकार का कहना है कि यह रोना-धोना गलत है क्योंकि पिछले बारह सालों में देश में प्रति व्यक्ति आय भी तो 2.63 गुना हो चुकी है। 2013-14 में प्रति व्यक्ति आय 79,118 रुपए हुआ करती थी। यह 2025-26 में 2,08,090 रुपए हो चुकी है।
ये आंकड़े दरअसल मरीचिका हैं, झांसा हैं। ये प्रति व्यक्ति आय का नॉमिनल डेटा है जिसमें महंगाई शामिल है। तब भी इसकी सालाना विकास दर 8.39% निकलती है। इस दौरान देश में मुद्रास्फीति की औसत सालाना दर 5.64% रही है। इसे घटा दें तो प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक सालाना वृद्धि दर 2.75% निकलती है। फिर सरकार के इस दावे का क्या करें, जिसमें वो इस दौरान वास्तविक जीडीपी के औसतन 6.2% की सालाना दर से बढ़ने का डंका बजाती है। जानमाने अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा का कहना है कि सरकार का दावा नकली है और हमारे जीडीपी की रीयल या वास्तविक विकास दर बहुत हुआ तो 4.5% के आसपास रही है। प्रति व्यक्ति आय की वास्तविक सालाना वृद्धि दर के 2.75% ही रहने से भी सरकारी जीडीपी के 6.2% बढ़ने पर सवालिया निशान लग जाता है। सरकार के अन्य विभाग के डेटा से भी इसी तरह की विसंगति उजागर होती है।
केंद्र सरकार का सांख्यिकी व कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय जीडीपी, मुद्रास्फीति व औद्योगिक मूल्य सूचकांक जैसे मापको के साथ ही सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण भी जारी करता है जिसमें रोज़गार, बेरोज़गारी और आय तक का डेटा होता है। सही तुलना के लिए हमारे पास 2017-18 से लेकर 2023-24 तक का डेटा उपलब्ध है। मार्च 2018 से मार्च 2024 तक के इन छह सालों में जहां रिटेल मुद्रास्फीति 100 के आधार से 136 तक पहुंची है तो वेतनभोगी की आय 100 से 125 और स्वरोज़गार में लगे लोगों की आय 100 से 113 पर पहुंची है। इस दौरान केवल अस्थाई या कैजुअल मजदूरों की आय मुद्रास्फीति को मात कर सकी है। जहां मुद्रास्फीति 100 से 136 पर पहुंची, वहीं कैजुअल मजदूरों की आय 100 से 162 हो गई। यह सारा डेटा केंद्रीय सांख्यिकी मंत्रालय के सावधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) पर आधारित है। इसमें किसी मिलावट या बाहरी डेटा का दखल नहीं।
यह डेटा साफ करता है कि देश में वेतनभोगी और स्वरोज़गार में लगे लोगों की आय मुद्रास्फीति से कम बढ़ी है, जबकि जिन कैजुअल श्रमिकों की आय मुद्रास्फीति से अधिक बढ़ी है, वे इतना कम कमाते हैं कि मुश्किल से भरण-पोषण कर पाते हैं। मसलन, 2025-26 में अगर किसी कैजुअल श्रमिक को महीने में तीसों दिन काम मिल गया हो, तब भी 453 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से उसकी मासिक आय 13,590 रुपए बनती है, जबकि इस दौरान स्वरोजगार में लगा व्यक्ति 14,861 रुपए और वेतनभोगी व्यक्ति 22,699 रुपए औसतन प्रति माह कमा रहा था। यहां गौर करने लायक तथ्य यह है कि देश में महंगाई की मार से सबसे ज्यादा त्रस्त स्वरोजगार में लगे लोगों का हिस्सा बढ़ता गया है, जबकि वेतनभोगी लोगों और कैजुअल मजदूरों का हिस्सा घटा है। निजी रिसर्च संस्थान सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के डेटा के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में देश में कामकाज़ कर रहे कुल लोगों में स्वरोजगार में लगे लोगों का हिस्सा 52%, वेतनभोगी लोगो का हिस्सा 24% और अस्थाई मजदूरों का हिस्सा भी 24% था। वहीं, वित्त वर्ष 2023-24 में स्वरोजगार में लगे लोगों का हिस्सा बढ़कर 58% हो गया, जबकि वेतनभोगी लोग घटकर 23% और अस्थाई मजदूर घटकर 19% रह गए। जाहिर है कि जिस स्वरोजगार का श्रेय लेने में मोदी सरकार लगी रही, उसकी हालत सबसे ज्यादा खराब हुई है। इस पर यह लोकप्रिय कहावत एकदम फिट बैठती है कि जहं-जहं पांव पड़े संतन के, तहं-तहं बंटाधार।
मोदी सरकार के कदम अवाम के बडे हिस्से का बंटाधार किए जा रहे हैं। इसे कोई भी रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति में ब्याज दर घटा या बढ़ाकर दुरुस्त नहीं कर सकता। रोज़गार के अवसर पैदा करना और आय बढ़ाने का इंतज़ाम करना सरकार की जिम्मेदारी है। जब तक वो अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाती, तब तक देश का व्यापक अवाम मुद्रास्फीति पर काबू के आंकड़ों के बावजूद महंगाई की मार से त्राहि-त्राहि करता रहेगा। खास बात यह है कि मुद्रास्फीति और महंगाई की यह विसंगति अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों में भी तेज़ी से उभर रही है। अमेरिका में इसे ‘अफोर्डेबिलिटी क्राइसिस’ और ब्रिटेन में ‘कॉस्ट-ऑफ-लिविंग क्राइसिस’ कहा जा रहा है। इसे हम अपनी भाषा में सहनीयता का संकट और जीवन-यापन की लागत का संकट कह सकते हैं। लेकिन असली बात यह है कि इन विकसित देशों में अवाम को अब मुद्रास्फीति की दरों से बहलाना आसान नहीं रह गया है। वे महंगाई की असल मार को आधार बनाकर फैसला करने लगे हैं कि किस राजनीतिक दल को वोट देना है और किसको नहीं। भारत में भी ऐसी ही होना चाहिए। लेकिन कब तक ऐसा हो पाएगा, पता नहीं।
