देश-दुनिया के लिए भारत की 65% युवा आबादी उसकी ऐसेट या आस्ति है। लेकिन सरकार ऐसा नहीं मानती क्योंकि मान लें तो उसे इसकी ज़िमेमदारी उठानी पड़ेगी, इसे अपना मानकर संभालना पड़ेगा। कोई एक भी युवा रोज़गार में नहीं लगा तो सरकार को इस राष्ट्रीय नुकसान की भरपाई उस खजाने से करनी पड़ेगी जिसे वो इनकम टैक्स, कॉरपोरेट टैक्स, कैपिट गेन्स टैक्स, सिक्यूरिटीज़ ट्रांजैक्शन टैक्स व प्रॉपर्टी टैक्स जैसे प्रत्यक्ष और कस्टम, एक्साइज़ व जीएसटी जैसे परोक्ष टैक्स के साथ ही देश व जनता के नाम पर लिए गए ऋण से जुटाती है। सरकार इस दायित्व से भागना चाहती है तो मानती ही नहीं कि देश में कहीं कोई बेरोज़गारी है। केंद्र सरकार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेष कृपा से श्रम व रोजगार के साथ ही युवा मामलों व खेल के भी मंत्री बने मनसुख मंडाविया दावा करते हैं कि जहां दुनिया में बेरोज़गारी की औसत दर 4.8% है, वही भारत में यह दर घटते-घटते 3.1% पर आ चुकी है। जाने कहां से वे रिसर्च खोजकर ले आए कि भारत में वित्त वर्ष 2017-18 से 2023-24 तक रोज़गार इलास्टिसिटी 1.11 रही है यानी जीवीए (ग्रॉस वैल्यू ऐडेड) के 1% बढ़ने पर रोज़गार 1.1% बढ़ा है, जबकि 2011-12 से 2017-18 तक रोज़गार इलास्टिसिटी मात्र 0.008 रही थी। मोदी सरकार ने 2014 से 2024 तक 17 करोड़ से ज्यादा नए रोज़गार पैदा किए हैं। अब मंगलवार की दृष्टि…
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