मोदी सरकार ने विकास का जो मॉडल देश पर थोपा, उसके केंद्र में किसान, मजदूर, नौजवान या छोटे उद्योग-धंधे नहीं, बल्कि देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र था। उसके मेक-इन इंडिया का नारा था देश में बनाओ, विदेश में बेचो। लेकिन देशी-विदेशी कॉरपोरेट क्षेत्र को लग गया कि उसने पूंजी लगाकर बड़े उद्योग खड़े भी कर दिए तो मोदी सरकार उन्हें अदाणी और अम्बानी जैसे यारों को सौंप देगी। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रह्मणियन तक ‘डबल-ए’ का खतरा गिना चुके हैं। देश का कॉरपोरेट क्षेत्र भी अब मुखर होने लगा है। कुछ दिन पहले ही फोर्ब्स मार्शल के चेयरमैन नौशाद फोर्ब्स ने सरकार पर अदाणी, अंबानी और टाटा समूह को तरजीह देने की बात लिखकर बोली है। वेदांता समूह के साथ हुआ अन्याय सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है। सारी दुनिया जानती है कि कैसे रतन टाटा जैसे कद्दावर उद्योगपति को नागपुर जाकर संघ के दरबार में हाज़िरी लगानी पड़ी। एक तरफ देश का डेमोग्राफिक डिविडेंड नौजवान दर-दर आवारा भटकने को मजबूर हैं। दूसरी तरफ विशाल बाज़ार बना मध्यवर्ग हैरान-परेशान है। आम घरों पर चढ़ा कर्ज जीडीपी का 41% हो चुका है, जबकि वित्तीय बचत पांच दशक के न्यूनतम स्तर 5.1% पर है। बाज़ार घटने से अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश का डेटा ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (जीएफसीएफ) 2022-23 से 2025-26 तक जीडीपी के 32.4-2-3% पर अटका है। अब गुरुवार की दशा-दिशा…
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