वो सभा, सभा नहीं जिसमें गुरुजन न हों। वे गुरुजन, गुरुजन नहीं जिनकी वाणी में सदाचार न हो। वह सदाचार, सदाचार नहीं जिसमें सत्य न हो। वो सत्य, सत्य नहीं जो किसी को कपट के लिए उकसाता हो।  और भीऔर भी

बड़ा आसान है निष्कर्षों में सच को फिट करके संतुष्ट हो जाना। लेकिन सच से निष्कर्षों को निकालना उतना ही मुश्किल है क्योंकि अपने करीब पहुंचते ही सच खटाक से नई-नई परतें खोलने लग जाता है।और भीऔर भी

बच्चा जन्म के कुछ दिन तक चीजों को उल्टा देखता है क्योंकि आंखें रेटिना पर उल्टी ही छवि बनाती हैं। फिर दिमाग सब कुछ सीधा दिखाने लगता है। कहीं जो हमें दिखता है, सच उसका उल्टा तो नहीं!!और भीऔर भी

जब चील गुरुत्वाकर्षण को तोड़ दूर गगन से धरती का निरीक्षण कर सकती है, इंसान जब हज़ारों मील ऊपर जहाज उड़ा सकता है, तब हम अपने अहम व पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सच को क्यों नहीं देख सकते।और भीऔर भी

इनफोसिस ने अपेक्षा से बेहतर नतीजे घोषित किए। लेकिन बाकी साल के अनुमान घटा दिए। फिर भी इसके शेयरों में उछाल गया। इसका कारण यह है कि बाजार में हर कोई शॉर्ट हुआ पड़ा है जबकि डाउनग्रेड का दौर अब खत्म हो चुका है और अपग्रेड का क्रम शुरू हो गया है। इससे आपका साबका भले ही न पड़ा हो, लेकिन ऐसा होना आम नियम और व्यवहार है। रुपए का अवमूल्यन सॉफ्टवेयर निर्यात करनेवाली कंपनियों की मददऔरऔर भी

हम अपनी ही आभा की झूठी चकाचौंध और भ्रमों के बोझ तले इस कदर दबे रहते हैं कि असली सच को देख नहीं पाते। वह सच, जो हम से पूरी तरह स्वतंत्र है, जिससे हमारी पूरी दुनिया संचालित होती है।और भीऔर भी

निरंकुशता और अविश्वास के बीच ही असत्य पलता है। भरोसे और भाईचारे के परिवेश में सत्य पनपता है। असत्य पर सत्य की जीत कभी आसानी से नहीं होती। लंबे संघर्ष में असत्य का संहार करना पड़ता है।और भीऔर भी

बाजार दो दिन की हिचकी के बाद फिर बढ़ गया। सेंसेक्स में 1.47 फीसदी तो निफ्टी में 1.45 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई। लेकिन अभी यह कहना बहुत जल्दबाजी होगी कि बाजार सबसे निचले धरातल पर पहुंचने के बाद उठने लगा। हालांकि न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के संकेत साफ नजर आने लगे हैं। निवेशक समुदाय एक तरफ से केवल पुट ऑप्शन यानी बेचने के अधिकार वाले ऑप्शन ही खरीद रहा है। इस महीने इस तरह केऔरऔर भी

सपनों की तरह हमारी अंतःप्रेरणा भी कहीं आसमान से नहीं टपकती। वह हमारे प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से संचित अनुभवों से निकलती है। इसलिए कोई अदृश्य प्रभाव जान उसे हमेशा सही मानने का कोई तुक नहीं है।और भीऔर भी

हम सही सवाल पूछना शुरू कर दें तो समझिए कि सच तक पहुंचने की हमारी आधी यात्रा पूरी हो गई। लेकिन हम तो ‘होता है, चलता है’ की सोच के ऐसे आदी हो गए हैं कि चौंकते ही नहीं, सवाल ही नहीं पूछते।और भीऔर भी